
बिलासपुर में ट्रैफिक सुधार के नाम पर क्या प्रशासन ने लोगों की सुरक्षा से समझौता कर लिया है? इंदिरा सेतु पुल पर की गई नई व्यवस्था ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस पुल से रोज़ हजारों वाहन गुजरते हैं, वहां बांस की बल्लियों और अस्थायी बैरिकेड्स से डिवाइडर खड़ा कर दिया गया है। जाम से राहत देने का दावा करने वाली यह व्यवस्था अब खुद हादसों को न्योता देती नजर आ रही है।वीओ – यह है बिलासपुर का इंदिरा सेतु पुल, शहर की सबसे अहम ट्रैफिक लाइफलाइन। पुल के बीचों-बीच बांस की बल्लियां, लोहे के स्टॉपर और अस्थायी बैरिकेड्स लगाकर डिवाइडर बना दिया गया है। देखने में यह व्यवस्था जितनी कमजोर है, उतनी ही खतरनाक भी। तेज रफ्तार वाहन अचानक संकरे रास्ते में फंस रहे हैं, जिससे टकराव का खतरा बढ़ गया है।दोपहिया वाहन चालकों के लिए यह डिवाइडर किसी जाल से कम नहीं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले ट्रैफिक धीमा जरूर था, लेकिन सुरक्षित था। अब अचानक ब्रेक लग रहे हैं, पीछे से टक्कर का खतरा कई गुना बढ़ गया है। रात के समय हालात और भयावह हो जाते हैं।सबसे गंभीर बात यह है कि इस अस्थायी डिवाइडर पर न तो पर्याप्त रिफ्लेक्टर हैं और न ही चेतावनी संकेत। अंधेरे में बांस की बल्लियां दिखाई तक नहीं देतीं। ज़रा सोचिए, अगर कोई तेज रफ्तार वाहन इससे टकरा जाए, तो अंजाम कितना भयानक हो सकता है।डिवाइडर लगने के बाद ओवरटेक की कोई गुंजाइश नहीं बची है। पीक आवर्स में लंबा जाम लग रहा है। एम्बुलेंस और आपातकालीन वाहनों को भी रास्ता मिलने में भारी दिक्कत हो रही है। लोगों का कहना है कि जाम कम होने के बजाय और बढ़ गया है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि राज्य के पहले ऐसे पुल पर स्थायी और सुरक्षित कंक्रीट डिवाइडर या सेफ्टी बैरियर की जगह बांस और अस्थायी बैरिकेड्स क्यों लगाए गए।क्या यह बजट की कमी है या बिना तकनीकी जांच के जल्दबाजी में लिया गया फैसला।ट्रैफिक विशेषज्ञ इसे बेहद खतरनाक बता रहे हैं।सवाल साफ है क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतज़ार कर रहा है या समय रहते इस खतरनाक व्यवस्था को हटाकर वैज्ञानिक और सुरक्षित ट्रैफिक प्लान लागू किया जाएगा।फिलहाल जाम से राहत के नाम पर इंदिरा सेतु पुल, बिलासपुर के लिए खतरे का पुल बनता जा रहा है।




