
जिले में आवारा पशुओं की समस्या दिन-ब-दिन गंभीर होती जा रही है लेकिन पशु चिकित्सा विभाग की उदासीनता और प्रशासनिक खींचतान के चलते हालात जस के तस बने हुए हैं। संयुक्त संचालक पशु चिकित्सा विभाग की हालिया रिपोर्ट ने शासन की योजनाओं और जमीनी हकीकत के बीच गहरे अंतर को उजागर कर दिया है। सड़कों और हाईवे पर घूमते बेसहारा पशु न सिर्फ यातायात के लिए खतरा बन रहे हैं बल्कि कई दुर्घटनाओं का कारण भी बन चुके हैं रिपोर्ट के अनुसार जिले में आवारा पशुओं के संरक्षण के लिए 40 गोधामों की आवश्यकता आंकी गई थी लेकिन शासन स्तर पर केवल 5 गोधामों को ही स्वीकृति मिली है। इनमें मस्तूरी क्षेत्र में जैतपुर, ओखर और कनई खोदरा, तखतपुर में लाखासर तथा बिल्हा में हरदीकला शामिल हैं।

यह व्यवस्था बढ़ती समस्या के सामने नाकाफी साबित हो रही है जिससे आवारा पशुओं को लेकर की गई योजना कागजों तक ही सीमित नजर आ रही है।सबसे बड़ी विडंबना रंगीन बेल्ट योजना को लेकर सामने आई है जिसके तहत विभाग ने मात्र 500 पशुओं को चिन्हित करने का दावा किया है। हालांकि शहर की सड़कों पर ऐसे बेल्ट लगे पशु कहीं नजर नहीं आते। जब इस पर सवाल उठाए गए तो संयुक्त संचालक डॉ. जी.एस.एस. तंवर ने शहर क्षेत्र की जिम्मेदारी नगर निगम पर डालते हुए स्वयं को अलग कर लिया।

विभाग का यह तर्क कि अकेले पशु चिकित्सा विभाग कुछ नहीं कर सकता समन्वय की कमी को साफ तौर पर दर्शाता है। केवल 10 रुपये प्रतिदिन के अपर्याप्त बजट और आपसी तालमेल के अभाव में आवारा पशुओं को लेकर ठोस कार्रवाई नहीं हो पा रही है। विभाग द्वारा पशुओं को हाईवे की ओर धकेलने जैसे बयान प्रशासनिक असफलता की ओर इशारा करते हैं। इस लचर व्यवस्था का खामियाजा एक ओर जहां आम नागरिक भुगत रहे हैं वहीं दूसरी ओर बेजुबान पशु भी असुरक्षित हालात में भटकने को मजबूर हैं।




