ग्राम बरगवां गुड़ी चौक में श्रीमद्भगवद्गीता का दूसरा दिन l
गीता के आध्यात्मिक रहस्यों से होगा जीवन में हर समस्या का समाधान
परमात्मा से प्रीत बुद्धि ही सच्चे पांडव हैं- ब्रम्हाकुमारी शशिप्रभा l
मुनिवार वेदव्यास जी ने आध्यात्मिक रहस्य को सुगम रीति से जनमानस को समझाने हेतु एक कहानी का निर्माण किया उसका नाम रखा महाभारत की कथा l
बरगवां :-गुड़ी चौक में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भगवत गीता ज्ञान यज्ञ कार्यक्रम में ब्रह्माकुमारी शशिप्रभा दीदी ने कही। आपने बतलाया कि गीता से हिंसा की प्रेरणा न लें, इससे तो मन के नकारात्मक व सकारात्मक विचारों के युद्ध और उसमें सही निर्णय अर्थात् धर्म के पक्ष में निर्णय लेने की शिक्षा मिलती है।मुनिवार वेदव्यास जी ने आध्यात्मिक रहस्य को सुगम रीति से जनमानस को समझाने हेतु एक कहानी का निर्माण किया उसका नाम रखा महाभारत की कथा l
श्रीमद्भगवद्गीता के आध्यात्मिक रहस्यों का स्पष्टीकरण करते हुए दीदी जी ने आगे कहा कि एक अर्जुन के विषाद की बात नहीं है, आज हर एक व्यक्ति के जीवन में विषाद अर्थात् तनाव, अवसाद का समय आता है और तब यह ज्ञान हमें हमारे समस्या का समाधान देता है, दिलशिकस्तपन, अधीरता, तनाव, अवसाद को दूर करता है। यह पारिवारिक, सामाजिक व राष्ट्रीय के साथ वैश्विक स्थिति का भी समाधान देता है। परिवर्तन को अपनाने की क्षमता प्रदान करता है। भगवान बुद्धिमानों की बुद्धि है जब हम उनसे संबंध जोड़कर योग लगाते हैं तो हमारी विवेक शक्ति जागृत होती है जो युवाओं व छात्र-छात्राओं के लिए बहुत उपयोगी है। आज घर-घर में महाभारत की स्थिति दिखाई दे रही है और इस समय में स्वयं भगवान यदा-यदा हि धर्मस्य… श्लोक के अनुसार धरती पर अवतरित होकर गीता ज्ञान सुना रहे हैं।
पाण्डवों और कौरवों का रहस्य बताते हुए कहा कि युद्ध जैसी स्थिति में भी स्थिर व संतुलित बुद्धि के परिचायक युधिष्ठिर, आत्मबल, मनोबल व परिस्थिति को जड़ से उखाड़ देने की क्षमता भीम को दर्शाता है, अर्जुन अर्थात् ज्ञान का अर्जन करने व भगवान की बातों पर हांजी कर अमल में लाने वाला, नकुल अर्थात् नियमों पर चलने वाले, संयमित व सिद्धांतवादी, सहदेव अर्थात् हर शुभकार्य, धार्मिक कार्य में बिना किसी अपेक्षा के सहयोगी बनना। कौरव अधर्म पक्ष का वाचक है जिसमें धृतराष्ट्र राज्यसत्ता, बाहुबल, भूमिबल और अहंकार से युक्त अंधत्व की निशानी, गांधारी देखते हुए भी देखना नहीं चाहती, सभी कौरवों के नाम ‘दु’ शब्द से शुरू होते हैं। धर्म व धन का दुरूपयोग करने वाला दुर्योधन के समान है। जिसके जीवन में अनुशासन नहीं वह दुस्साशन हैं दुष्टता के भाव वाले, धृतराष्ट्र अर्थात जिस राष्ट्र को धृत भावना ने हड़प कर लिया हो पुत्र के मुंह में अंधा हो,अन्याय का साथ देते हैं l ग्राम वासियों ने बहुत जिज्ञासा से अध्यात्मिक रहस्यों का श्रवण किया lअंत में सभी नेआरती की व प्रसाद बांटा गया l






