
तोरवा थाना क्षेत्र से दो नाबालिग बच्चियों को रोते हुए मिलने का मामला अब तूल पकड़ चुका है। जशपुर से लाई गई इन बच्चियों ने चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। बच्चियों के मुताबिक उन्हें जबरन काम के लिए लाया गया और एक पुलिसकर्मी के घर में प्रताड़ित किया गया। मामले ने अब मानव तस्करी का रूप ले लिया है और छत्तीसगढ़ का सर्व आदिवासी समाज खुलकर सामने आ गया है।घटना लालखदान क्षेत्र की है, जहां एक मोबाइल दुकान के पास दो बच्चियां रोती हुई मिलीं। स्थानीय लोगों की सूचना पर पहुंची पुलिस को बच्चियों ने बताया कि वे जशपुर से लाई गई हैं और पुलिसकर्मी अरुण लकड़ा के घर काम कर रही थीं। बच्चियों का कहना है कि उनके साथ मारपीट होती थी, मानसिक प्रताड़ना दी जाती थी और वे वहां नहीं रहना चाहती थीं। उनके नाम पर पैसा भी किसी और को मिलता था।

बच्चियों ने यह भी बताया कि उन्हें यहां उनके मुंहबोले रिश्तेदारों ने छोड़ दिया और पढ़ाई का झांसा देकर काम में झोंक दिया गया। फिलहाल पुलिस ने दोनों बच्चियों को चाइल्ड लाइन के संरक्षण में भेज दिया है और उनके असली परिजनों से संपर्क की कोशिश जारी है। मामले की जांच ह्यूमन ट्रैफिकिंग के एंगल से की जा रही है।इस गंभीर मामले ने छत्तीसगढ़ के आदिवासी समाज को झकझोर दिया है। सर्व आदिवासी समाज के प्रदेश अध्यक्ष सुभाष परते ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि आदिवासी बच्चों का शोषण अब सहन नहीं होगा। यह मानवीय अपराध है और दोषियों को जेल भेजा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि कई बार दिल्ली-मुंबई जैसे बड़े शहरों में भी आदिवासी बच्चों की तस्करी के मामले सामने आते हैं।सर्व आदिवासी समाज के प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि सरकार को इस मामले में कड़ा फैसला लेना चाहिए।बच्चों को प्रताड़ित करना और घरेलू काम के नाम पर उनका इस्तेमाल करना पूरी तरह से अमानवीय है।हम इस पर मुख्यमंत्री से मुलाकात करेंगे। बिलासपुर में सामने आई इस घटना ने एक बार फिर बच्चों के शोषण, तस्करी और आदिवासी समाज की सुरक्षा को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। अब जरूरत है कि शासन-प्रशासन इस मामले को केवल जांच तक सीमित न रखे, बल्कि दोषियों को जल्द सजा दिलाए ताकि भविष्य में कोई भी आदिवासी बच्चा शिकार न बने।




