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झाझरिया कंपनी की सुस्ती से बिलासपुर स्टेशन का पुनर्विकास पटरी से उतरा,गेट नंबर 3 से 4 तक अव्यवस्था का आलम, यात्री बोले– विकास से ज़्यादा झेलनी पड़ रही है परेशानी

बिलासपुर रेलवे स्टेशन के कायाकल्प का सपना अब यात्रियों की मुसीबत बन गया है। झाझरिया प्राइवेट लिमिटेड को जब से स्टेशन के पुनर्विकास का जिम्मा सौंपा गया, तब से यहां अव्यवस्था, लापरवाही और देरी का माहौल बना हुआ है। एक तरफ स्टेशन का चेहरा बदलने की बात, दूसरी तरफ यात्रियों की तकलीफें बढ़ती जा रही हैं। स्टेशन का सबसे अहम हिस्सा गेट नंबर 3 से गेट नंबर 4 तक का इलाका बेतरतीब तरीके से घेर दिया गया है। यहां से हर दिन हजारों यात्री निकलते हैं, लेकिन अब उन्हें संकरी जगह से होकर निकलना पड़ रहा है। शेड और बैरिकेडिंग से आवाजाही बाधित है, कोई स्पष्ट संकेत या वैकल्पिक रास्ता मौजूद नहीं है।एसईसीआर जोन के अन्य स्टेशनों पर काम समय पर पूरा हो चुका है।

उनका लोकार्पण भी हो गया है। लेकिन बिलासपुर, जो कि इस जोन का एकमात्र मुख्यालय है, वह अभी भी अधूरे निर्माण और जमी धूल में उलझा हुआ है। कायाकल्प का सपना यहां हकीकत से कोसों दूर नजर आता है।झाझरिया कंपनी पर पहले सीबीआई का छापा पड़ा था, जिसके बाद से काम ठप हो गया। अब जबकि काम फिर से शुरू हुआ है, कंपनी के इंजीनियर और मैनेजर पूरी तरह से गैरजिम्मेदार दिख रहे हैं। संवेदनशील निर्माण क्षेत्र को सार्वजनिक उपयोग में छोड़ दिया गया है जहां रेलकर्मी अपने वाहन खड़े कर रहे हैं। ये न केवल अव्यवस्था है बल्कि सुरक्षा में भी भारी चूक है।

इस पूरे मामले पर केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू का कहना है कि “काम में बाधाएं आती हैं, लेकिन इसे गंभीरता से लेते हुए जल्द पूरा करने के निर्देश दिए गए हैं।” लेकिन यात्री सवाल पूछ रहे हैं कि अगर यही रफ्तार रही तो क्या स्टेशन कभी समय पर बन पाएगा? या फिर यह भी एक और अधूरा प्रोजेक्ट बनकर रह जाएगा? बिलासपुर स्टेशन केवल एक रेलवे जंक्शन नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ का बड़ा ट्रांजिट पॉइंट है। ऐसे में उसके पुनर्विकास का ठप पड़ जाना केवल यात्रियों की परेशानी नहीं, बल्कि रेलवे की कार्यशैली पर भी बड़ा सवाल है। अब देखना ये है कि रेलवे और झाझरिया कंपनी इस जिम्मेदारी को कितनी गंभीरता से लेते हैं, या फिर ये निर्माण कार्य भी हमेशा की तरह ‘चल रहा है’ की पट्टी तले दम तोड़ देगा।

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