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ठेका मजदूर की मौत पर उबाल,परिजनों का धरना, रेलवे के खिलाफ गुस्सा,मुआवजा व नौकरी की मांग पर अड़े प्रदर्शनकारी, हाईकोर्ट की सुनवाई का हवाला देकर रेलवे ने दी सफाई…

बिलासपुर— बिलासपुर रेलवे कोचिंग डिपो हादसे में ठेका मजदूर प्रताप बर्मन की मौत के बाद मुआवजे को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। हादसे के चार दिन बाद भी परिजनों और ग्रामीणों का आंदोलन जारी है। डीआरएम ऑफिस के सामने प्रदर्शनकारियों ने धरना दिया और भंडारा कर पूरी रात वहीं गुज़ारी। ओएचई तार की चपेट में आकर घायल हुए और फिर दम तोड़ चुके ठेका मजदूर प्रताप बर्मन के परिवार ने डीआरएम कार्यालय के बाहर मोर्चा खोल दिया है। परिजन और समर्थक एक करोड़ रुपए मुआवजा, मृतक की पत्नी को नौकरी और बच्चे की पढ़ाई का खर्च उठाने की मांग पर अड़े हुए हैं। उनका आरोप है कि रेलवे प्रशासन जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रहा है और घटना पर गलत दलीलें दे रहा है।आंदोलनकारियों ने कहा कि प्रताप बर्मन कोचिंग डिपो का ठेका कर्मी था, ऐसे में यह कहना कि वह बिना अनुमति के चढ़ा था, सरासर झूठ है। उनका कहना है कि बिलासपुर जोन ने वर्ष 2024-25 में 25 हजार करोड़ रुपए का राजस्व अर्जित किया, फिर भी एक ठेका मजदूर की मौत पर उसके परिवार की सुध नहीं ली जा रही है। आरोप है कि ठेका कर्मियों को न तो सुरक्षा उपाय दिए जाते हैं और न ही बीमा।आंदोलनकारियों ने कहा कि रेलवे अपने कर्मचारियों और ठेका मजदूरों की सुरक्षा के प्रति पूरी तरह लापरवाह है। इतने बड़े हादसे के बाद भी केवल औपचारिकता निभाई जा रही है। प्रदर्शनकारियों ने यह भी सवाल उठाया कि सामान्य दुर्घटनाओं में भी मुख्यमंत्री राहत कोष से 50 से 60 लाख तक की मदद दी गई है, लेकिन इस मामले में रेलवे और राज्य सरकार दोनों ही केवल 5 से 16 लाख रुपए मुआवजे की बात कर रहे हैं। उनका कहना है कि यह राशि पीड़ित परिवार के जीवनयापन के लिए बिल्कुल नामुमकिन है।जब सांसदों और विधायकों को आजीवन पेंशन और तमाम सुविधाएं मिल सकती हैं, तो एक ठेका मजदूर की पत्नी को नौकरी और बच्चे को शिक्षा का अधिकार क्यों नहीं मिल सकता। इस पूरे विवाद पर बिलासपुर रेल मंडल के सीनियर डीसीएम अनुराग सिंह ने सफाई दी है। उन्होंने कहा कि हादसों से जुड़े मामलों पर हाईकोर्ट में सुनवाई के बाद रेलवे ने विस्तृत रिपोर्ट पेश की है। कोर्ट के निर्देशानुसार लेबर कमिश्नर से मिलने वाले अवॉर्ड के आधार पर ही मुआवजा राशि दी जाएगी। अनुराग सिंह ने दावा किया कि विभागीय प्रक्रिया चल रही है और सामान्यतः मुआवजा दो माह के भीतर दिया जाता है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि न्यायालय के आदेश और नियमों के मुताबिक पीड़ित परिवार को सहायता अवश्य दी जाएगी। फिलहाल आंदोलनकारी साफ कर चुके हैं कि जब तक एक करोड़ रुपए मुआवजा और नौकरी की मांग पूरी नहीं होती, वे पीछे नहीं हटेंगे। रेलवे ठेका मजदूर की मौत से उपजा यह विवाद अब जनआंदोलन का रूप लेता जा रहा है। ऐसे नहीं आप देखने वाली बात होगी कि अब केंद्र सरकार,रेलवे प्रशासन और राज्य सरकार आंदोलनकारियों की मांगों पर कब और कितना गंभीर रुख अपनाते हैं।

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