
छत्तीसगढ़ कर्मचारी अधिकारी फेडरेशन संघ की 29 से 31 दिसंबर तक चली तीन दिवसीय प्रदेशव्यापी हड़ताल आज समाप्त हो गई। हड़ताल के अंतिम दिन बिलासपुर में संघ के पदाधिकारियों ने मुख्यमंत्री के नाम कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर आंदोलन स्थगित करने की घोषणा की। संघ के अनुसार इस हड़ताल को पूरे प्रदेश से करीब चार लाख अधिकारी–कर्मचारियों का समर्थन मिला। वहीं बिलासपुर जिले में हजारों कर्मचारी नेहरू चौक में धरने पर बैठे नजर आए। कर्मचारियों की मौजूदगी ने साफ संकेत दे दिया कि सरकार की नीतियों से कर्मचारी वर्ग में गहरा असंतोष पनप रहा है।संघ के पदाधिकारियों ने बताया कि उनकी 11 सूत्रीय मांगों को लेकर यह आंदोलन किया गया था। उनका कहना है कि सरकार ने चुनाव के समय मोदी की गारंटी और घोषणा पत्र में 100 दिनों के भीतर मांगें पूरी करने का वादा किया था, लेकिन दो साल बीत जाने के बाद भी वादे अधूरे हैं।पदाधिकारियों ने कहा कि इससे पहले एक दिवसीय आंदोलन किया गया था, लेकिन जब शासन–प्रशासन ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया, तो मजबूर होकर तीन दिवसीय हड़ताल करनी पड़ी। उन्होंने इस हड़ताल को सरकार के लिए “प्रशासनिक लॉकडाउन” बताते हुए कहा कि यह आंदोलन शासन के लिए एक बड़ा सबक है। हड़ताल के दौरान छत्तीसगढ़ सहायक शिक्षक फेडरेशन भी एक दिवसीय हड़ताल पर समर्थन देने पहुंची।शिक्षक संघ ने अपनी तीन सूत्रीय मांगों को लेकर शासन का ध्यान आकर्षित किया और साफ कहा कि अगर कर्मचारी अधिकारी फेडरेशन अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाती है, तो शिक्षक संगठन भी पूरा समर्थन देगा।संघ के कुछ पदाधिकारियों ने यह भी आरोप लगाया कि आज ही छत्तीसगढ़ सरकार का बजट सत्र हुआ, जिसमें 10 प्रस्ताव पास किए गए, लेकिन कर्मचारियों से जुड़ी एक भी मांग शामिल नहीं की गई। इससे कर्मचारियों में भारी नाराजगी और आक्रोश है। हालांकि, संघ ने बताया कि उपमुख्यमंत्री की ओर से संकेत मिले हैं कि जल्द ही कर्मचारियों के प्रतिनिधिमंडल को बुलाकर बातचीत की जाएगी। लेकिन कर्मचारियों ने साफ चेतावनी दी है कि अगर एक महीने के भीतर मांगें नहीं मानी गईं, तो वे अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने से पीछे नहीं हटेंगे।अब बड़ा सवाल यही है कि सरकार कर्मचारियों की इस चेतावनी को कितनी गंभीरता से लेती है, या फिर प्रदेश एक और बड़े आंदोलन की ओर बढ़ रहा है।




