
छत्तीसगढ़ में रविवार को व्यापम द्वारा आबकारी विभाग की आरक्षक भर्ती परीक्षा आयोजित की गई। उम्मीदवार समय से निकले, एडमिट कार्ड और तैयारी सब साथ लेकर पहुंचे थे।लेकिन जो नहीं मिला, वो था परीक्षा केंद्र का स्पष्ट पता। रेलवे स्टेशन क्षेत्र में मौजूद दो अलग-अलग रेलवे स्कूलों के भ्रम ने दर्जनों उम्मीदवारों को ऐसा उलझाया कि परीक्षा केंद्र तक पहुंचते-पहुंचते वक्त निकल गया। और जब पहुंचे तब तक परीक्षा कक्ष का दरवाज़ा बंद हो चुका था। रेलवे परीक्षा क्षेत्र में दो स्कूल रेलवे स्कूल नंबर एक और नंबर दो। लेकिन एडमिट कार्ड में सिर्फ “रेलवे स्कूल” लिखा गया।ऐसे में जो परीक्षार्थी बाहर जिलों से या अनजान स्थानों से आए थे, वे पहले एक स्कूल से दूसरे स्कूल भटकते रहे।आसपास पूछने पर भी लोगों को स्पष्ट जानकारी नहीं थी।

परीक्षा केंद्र के आसपास कोई बोर्ड, संकेतक या गाइडेंस नहीं था,जिससे परीक्षार्थियों और छात्राएं भटकते-भटकते 10:45 बजे तक किसी तरह पहुंचे लेकिन परीक्षा का गेट 10:30 बजे ही बंद कर दिया गया था।छात्रों ने बताया कि वे सुबह से 1 घंटे पहले ही घर से निकल चुके थे, उन्होंने समय का पूरा ध्यान रखा था क्योंकि उन्हें पता था कि 10:30 के बाद प्रवेश नहीं मिलेगा। लेकिन जब परीक्षा केंद्र ही ठीक से चिन्हित न हो, तो समय का पालन भी व्यर्थ हो जाता है। कुछ छात्राएं डरते-डरते गलियों में घूम रहीं थीं, क्योंकि रास्ता अनजान था, बोर्ड नदारद थे और गूगल मैप भी सही रास्ता नहीं दिखा पा रहा था।परीक्षार्थियों ने जब किसी तरह केंद्र के बाहर पहुंचकर गेट खुलवाने की गुहार लगाई तो उन्हें सख्त ‘ना’ सुनने को मिली। न तो केंद्र प्रभारी ने बात की, न ही पुलिस कर्मियों ने सहायता की। कई छात्र–छात्राएं फूट-फूट कर रोते रहे, हाथ जोड़कर विनती करते रहे कि उन्हें केवल एक बार अंदर जाने दिया जाए, वे साल भर की मेहनत लुटते देख रहे थे लेकिन किसी ने उनकी बात नहीं सुनी।

एक परीक्षार्थी ने बताया, हम काम करते हैं, पढ़ाई भी करते हैं, इसी उम्मीद में कि सरकारी नौकरी का सपना पूरा हो सके। महीनों तैयारी की, छुट्टियां लीं, पैसा खर्च किया और फॉर्म भरा। लेकिन अब केवल दस मिनट की देरी से सब कुछ चला गया।लगभग 18 से 20 परीक्षार्थी मायूस होकर लौटते नजर आए, जिनमें महिलाएं भी थीं, जो अकेले डरे-सहमे रास्ता खोजती रहीं और अंततः परीक्षा से वंचित रह गईं।परीक्षार्थियों की मांग थी कि परीक्षा केंद्र पर प्रमुख मार्गों तक कम से कम दिशा-सूचक बोर्ड लगाए जाएं, ताकि दूर-दराज से आए अभ्यर्थी समय पर और सही स्थान पर पहुंच सकें। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसी परिस्थितियों में कम से कम 15-20 मिनट की ‘लेटलतीफी विंडो’ होनी चाहिए, जब गलती परीक्षार्थी की नहीं बल्कि व्यवस्थाओं की हो।

सालभर की मेहनत, अनगिनत सपनों और संघर्ष के बीच परीक्षा केंद्र की पहचान में हुई चूक ने दर्जनों उम्मीदवारों का भविष्य अधर में छोड़ दिया। सवाल यह नहीं कि नियम क्या कहते हैं, सवाल यह है कि ज़रा सी संवेदनशीलता अगर दिखाई जाती, तो कुछ चेहरों पर आज मायूसी की जगह उम्मीद होती। अब ज़रूरत इस बात की है कि भविष्य की ऐसी परीक्षाओं में प्रशासन पारदर्शिता, स्पष्ट सूचना और मानवीयता तीनों का पालन जरूर करे। क्योंकि हर देरी गलती नहीं होती, और हर परीक्षा सिर्फ कागज़ पर नहीं होती कुछ ज़िंदगी की भी होती है।




