
फाइलेरिया उन्मूलन जैसे गंभीर जनस्वास्थ्य अभियान में प्रशासनिक लापरवाही अब खुलकर सामने आ गई है। जिले में फाइलेरिया रोकथाम के लिए चलाए गए MDA (मास ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन) कार्यक्रम का भुगतान महीनों से लंबित है, जिससे इस अभियान की रीढ़ मानी जाने वाली आंगनबाड़ी कार्यकर्ता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही हैं। सरकार एक ओर फाइलेरिया मुक्त भारत के दावे कर रही है, दूसरी ओर ज़मीनी अमले के साथ ऐसा अन्याय सवाल खड़े करता है।सूत्रों के अनुसार, MDA फाइलेरिया कार्यक्रम का आयोजन नियमानुसार किया गया और इसकी सभी औपचारिकताएं भी पूरी की गईं। इसके बावजूद एक वर्ष की तय समय-सीमा बीत जाने के बाद भी भुगतान नहीं किया गया। बार-बार पत्राचार और मौखिक अनुरोधों के बाद भी जिम्मेदार अधिकारी चुप्पी साधे बैठे हैं, मानो आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की मेहनत और समय की कोई कीमत ही न हो।भुगतान न मिलने से फाइलेरिया उन्मूलन अभियान पर भी असर पड़ने लगा है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता घर-घर जाकर दवा खिलाने, लोगों को समझाने और जोखिम उठाकर काम करती हैं। लेकिन जब मेहनत की कमाई ही अटक जाए, तो भविष्य में ऐसे अभियानों को लेकर उत्साह और भरोसा कैसे बना रहेगा? यह हालात खुद प्रशासन की कार्यशैली पर सवालिया निशान है।अब नाराज आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहयोगियों में उबाल है। उनका साफ कहना है कि यदि जल्द भुगतान नहीं हुआ तो वे सामूहिक रूप से विरोध दर्ज कराएंगी। फाइलेरिया जैसे गंभीर रोग से लड़ाई तभी सफल हो सकती है जब ज़मीनी कर्मचारियों का सम्मान और भुगतान समय पर हो। वरना कागज़ों में फाइलेरिया मुक्त भारत और हकीकत में बदहाल व्यवस्था के बीच की खाई और गहरी होती जाएगी।




