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बहुड़ा यात्रा के साथ भगवान जगन्नाथ वापस लौटे श्री मंदिर, रथ खींचने भक्तों का उमड़ा रेला।

महाप्रभु भगवान जगन्नाथ मौसी मां के घर नौ दिनों तक रहने के बाद सोमवार को अपने घर लौट आये। बहुड़ा यात्रा के रूप में उनकी रथयात्रा रेलवे परिक्षेत्र में निकली। बड़ी संख्या में एकजुट हुए श्रद्धालुओं ने उनके साथ रथ को खींचकर भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ मंदिर तक लेकर आए।इस दौरान चारों ओर जय जगन्नाथ की गूंज होती रही।

रेलवे परिक्षेत्र स्थित जगन्नाथ मंदिर में सोमवार को भक्तों की भीड़ जुटी रही। श्रद्घालु महाप्रभु भगवान जगन्नाथ की सवारी को मौसी मां के घर से वापस श्री मंदिर लेकर पहुंचे। बहुड़ा यात्रा में मंदिर के ही वरिष्ठ कमेटी के पदाधिकारी आर आर स्वाई ने अतिथि और राजा के रूप में शामिल होकर छेरा पहरा किया, साथ ही भक्तों के साथ मिलकर रथ भी खींची। इससे पहले सुबह मौसी मां का घर बने उड़िया समाज भवन में विराजित महाप्रभु जगन्नाथ का विशेष पूजन किया गया। इसके बाद अभिषेक श्रृंगार एवं महाभोग का कार्यक्रम हुआ। दोपहर में महाप्रभु, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा ने मौसी मां के घर से विदाई ली। इसके साथ ही श्री मंदिर के लिए रवाना हुए। इस अवसर पर रेलवे क्षेत्र सहित शहर से बड़ी संख्या में लोग रथ खींचने के लिए आगे आए। रथ यात्रा मौसी मां के मंदिर से काली मंदिर, जीएम कार्यालय, पोस्ट ऑफिस, जगमल चौक, इंदिरा गांधी चौक, तारबाहर चौक होते हुए श्री जगन्नाथ मंदिर पहुंची। इसके साथ ही मंदिर से भगवान के मौसी मां के घर जाने के बाद से बंद हुए मंदिर के पट फिर से खुल गए हैं। बहुड़ा यात्रा के अवसर पर मंदिर में भगवान को 56 भोग अर्पित किया गया। इसके तहत 56 प्रकार के व्यंजन के साथ ही विशेष खिचड़ी, पकवान और मिठाई भी चढ़ाई गई। इसके बाद मंदिर में उपस्थित भक्तों को भी प्रसाद के रूप में इन व्यंजनों का वितरण किया गया। सभी ने उत्साह से भगवान का प्रसाद ग्रहण किया।

पौराणिक मान्यता के अनुसार मां लक्ष्मी को बिना बताए भगवान जगन्नाथ द्वारा भाई-बहनों के साथ गुंडीचा मौसी के घर चले जाने से वे रूठ जाती हैं। तब विभिन्न मिष्ठान्न एवं वस्त्राभूषण भेंटकर भगवान उन्हें मनाते हैं। इसी का निर्वहन करते हुए मंदिर के पुजारी गोविंद प्रसाद पाढ़ी एवं अन्य श्रद्धालुओं ने इस रस्म को पूरा किया। इसके तहत मंदिर के सामने रथ के पहुंचने पर मंदिर के पट बंद कर दिए गए। ऐसे में भगवान ने मां लक्ष्मी की पसंदीदा व्यंजन रसगुल्ला एवं वस्त्र-आभूषण आदि प्रदान किया। तब मंदिर के पट खुले। इसके बाद तीनों ने मंदिर में प्रवेश किया।करीब 8 दिन तक मौसी मां के घर में रहने के दौरान श्री मंदिर के पट बंद थे। लिहाजा घंटियां भी सुनाई नहीं दे रही थी। मंदिर के पट खुलने एवं तीनों प्रतिमाओं की पुनर्स्थापना के बाद एक बार फिर घंटियों की गूंज से आसपास का वातावरण भक्तिमय हो गया। इसके साथ ही प्रतिदिन होने वाला पूजा-पाठ का सिलसिला भी शुरू हो गया।

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