बिलासपुर के बंगाली स्कूल में आयोजित दुर्गा पूजा को 101 वर्ष पूरे हो रहे हैं ।सोमवार को बोधन पूजा के साथ पांच दिवसीय उत्सव का आरंभ हुआ। बोधन अर्थात देवी को अस्त्र-शस्त्र प्रदान करना। बंगाल की परंपरा में महिषासुर मर्दिनी की पूजा अकाल बोधन से आरंभ की जाती है । पहले मां दुर्गा की पूजा चैत्र महीने में ही हुआ करती थी, लेकिन राम रावण युद्ध से पहले प्रभु श्री राम ने रावण को हराने के लिए पहली बार आश्विन माह में देवी की पूजा की। इसलिए इसे अकाल बोधन कहते हैं ,अर्थात असमय में पूजा। रावण को हराने के लिए भगवान राम को शक्ति चाहिए थी, इसके लिए उन्होंने देवी की उपासना की। इस दिन मंत्रो के जरिए देवी को जगाया गया, साथ ही कलश स्थापना कर बिल्लव पत्र के पेड़ की पूजा कर देवी का आहृवाहन किया गया।

विधि विधान से दुर्गा पूजा का संकल्प लिया गया। कल्प आरंभ यानी अकाल बोधन के साथ ही घट स्थापना हो गई ।1923 से आरंभ बंगाली संगठन के इस बहुप्रतीक्षित पूजा में इस बार 60 फीट ऊंचे पंडाल का निर्माण किया गया है, जिसे रामकृष्ण परमहंस देव की जन्मस्थली कमरपुकुर के मंदिर का स्वरूप दिया गया है । कोलकाता के कारीगरों ने यह पांडाल तैयार किया है। सोमवार को पंचमी पर बोधन पूजा किया गया। मंगलवार को माता विराजमान होगी ।अधिवास पूजा के साथ दुर्गा उत्सव आरंभ होगा। 10 अक्टूबर को अष्टमी पर सुबह 6:24 से 7:14 तक संधि पूजा होगी। 11 को महानवमी पर हवन पूजन किया जाएगा तो वही 12 अक्टूबर को विजयदशमी पर महिलाएं सिंदूरदान कर एक दूसरे को सिंदूर लगाएंगी।

बोधन पूजा के अवसर पर यहां अतिथि के तौर पर रेलवे के अधिकारी सम्मिलित हुए। बिलासपुर के सबसे पुराने दुर्गा पूजा को लेकर इस बार विशेष तैयारी की गई है ।आकर्षक पंडाल सज गया है। आसपास मेला भी भर रहा है। बिलासपुर में सर्वाधिक भीड़ यही उमड़ती है ।




