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Wednesday, March 4, 2026
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बिलासपुर में गैस चलित फर्नेश में शवों के अंतिम संस्कार के लिए तीन श्मशान घाट में मशीन लगे; लेकिन लोगों द्वारा इसे स्वीकार न कर पाने के कारण आज तक आरंभ नहीं किया जा।

अपनी जड़ों से जुड़े रहना अच्छी बात है। प्राचीन का सम्मान हो लेकिन नवीन का भी स्वागत होना चाहिए। भारतीय संस्कृति, खास कर सनातन संस्कृति इस मामले में बेहद लचीली रही है, जिसने समय के साथ आधुनिक संसाधनों को भी अपनाया है। हिंदू धर्म के 16 संस्कारों में से आखरी है अंतिम संस्कार, जहां शवो का दहन किया जाता है। जाहिर है इसके लिए बड़े पैमाने पर पेड़ों को काटना पड़ता है, क्योंकि लकड़ी से शव जलाए जाते हैं। शवदाह के समय उठने वाला धुंआ वायु प्रदूषण करता है, तो वहीं इससे निकले राख को नदियों में बहाया जाता है, जो जल प्रदूषण का कारण बनता है। शवदाह में बड़े पैमाने पर लकड़ी की खपत होने से जंगल घट रहे हैं। इसे देखते हुए शवदाह के गैर पारंपरिक तरीकों का भी इस्तेमाल होने लगा है। और यह कोई नई बात नहीं है। आज से 40 – 50 साल पहले से ही महानगरों में विद्युत शवदाह गृह बन चुके थे, तो वहीं कई स्थानों पर गैस से शवों का अंतिम संस्कार किया जाता है।

बिलासपुर में भी लोगों की मांग के बाद यह प्रयास किया गया, लेकिन योजना सफल नहीं हो सकी। विगत कई वर्षों से नगर निगम बिलासपुर द्वारा शहर के 3 मुक्तिधामों, सरकंडा, भारतीय नगर एवं दयालबंद में गैस द्वारा संचालित अंत्येष्टि भट्ठी यानी गैस क्रीमेशन फर्नेस लगा कर छोड़ दिया गया है। इसका आज तक न कोई उपयोग हुआ और शायद इसको बनाने वाली कंपनी ने इसे कभी चालू ही नहीं किया। आज पर्यावरण प्रदूषण अत्यंत कम करने में सहायक इस उपकरण का उपयोग आसानी से किया जा सकता है, जिससे कम से कम कार्बन उत्सर्जन से वायु, राख रहित होने से जल प्रदूषण अत्यंत कम हो सकता है। तब भी पता नहीं जिम्मेदार अधिकारी इसे आरंभ क्यों नहीं कर पा रहे हैं। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि शासन की ओर से प्रयास नहीं किया गया। अधिकारी बताते हैं कि आम लोग ही इसे स्वीकार नहीं कर पाए। अभी भी लोगों को लगता है कि पारंपरिक तरीके से ही शवों का संस्कार करने से उन्हें मुक्ति मिलती है, जबकि महानगरों के साथ प्रयागराज, हरिद्वार और काशी में भी इन्हीं माध्यमों से शवों का अंतिम संस्कार किया जा रहा है। इन मशीनों का प्रयोग न होने से यह जर्जर स्थिति में है, जिसे लेकर अधिकारियों ने भी अपनी चिंता जाहिर की है ।

क्षेत्र के जनप्रतिनिधि और पार्षद भी बताते हैं कि उन्होंने भी लोगों द्वारा इस प्रयोग को ठुकरा दिया जाने के बाद एसपी और अन्य अधिकारियों को पत्र लिखकर कम से कम लावारिस शवो का दाह संस्कार इसी विधि से करने की मांग की थी, लेकिन उस पर भी कोई पहल नहीं हो सकी। एक बार फिर इस प्रयास को दोहराने की बात वे कह रहे हैं।

वहीं दूसरी तरफ रोटरी, लायंस जैसी समाज सेवी संस्थाएं चाह रही हैं कि एक बार इसे आरंभ करके उनके सुपुर्द कर दिया जाए, जिससे कि वे इसका संचालन एवं मेंटेनेंस आदि की व्यवस्था कर सकें। उनका कहना है कि ऐसी कई संस्थाएं हैं जो इसका संचालन मानव सेवा के लिए करना चाहती है, जिनकी सेवा प्रशासन ले सकता है, क्योंकि इन उपकरणों के रूप में लोगों के टैक्स का पैसा बर्बाद हो रहा है।

इस मामले में सबसे बड़ी भूमिका आम लोगों की है जिन्हें समय के साथ होने वाले परिवर्तन को स्वीकार करना होगा। सनातन परंपराओं में शवों का दहन किया जाता है, चाहे वह लकड़ी से हो, विद्युत से या फिर गैस से। जिस तरह से खाना पकाने के लिए कभी लड़कियों का प्रयोग होता था। फिर मौजूदा दौर में बिजली से चलने वाले इंडक्शन और गैस चूल्हे का प्रयोग किया जा रहा है। सनातनियों ने इसे तो अंगीकार कर लिया, लेकिन पता नहीं वे कब परिजनों के शव के अंतिम संस्कार के लिए इन नए साधनों को स्वीकार करेंगे। बिलासपुर में आधुनिक सोच के साथ इसकी शुरुआत की गई लेकिन आम लोगों का ही सहयोग न मिलने से योजना सफल नहीं हो पायी, जिससे लाखों रुपए बर्बाद हो गए। आशा है कि कबाड़ में परिवर्तित होने से पूर्व इन उपकरणों को लोक कल्याण हेतु लोकार्पण कर दिया जाएगा।

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