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भाई-बहन के अटूट रिश्ते का पर्व रक्षाबंधन सोमवार को देश भर में हर्षोल्लास के साथ मनाया गया, भाइयों ने बहनों की आजीवन रक्षा करने का दिया वचन।

भाई बहन के अटूट रिश्ते का पर्व रक्षाबंधन सोमवार को हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। बहनों ने भाइयों की कलाइयां सजाई तो वही भाइयों ने बहनों की आजीवन रक्षा करने का वचन दिया।

भारत और सनातन संस्कृति संभवतः एकमात्र ऐसी संस्कृति है जहां सभी रिश्तों के लिए अलग-अलग पर्व है, ताकि सभी संबंधों को महत्व दिया जा सके। ऐसा ही एक पर्व है रक्षाबंधन ,जिसमें बहनें भाइयों की कलाई पर राखी बांधती है तो भाई उन्हें उपहार देकर उनकी रक्षा का वचन देते हैं। भारत में पौराणिक काल से रक्षाबंधन का पर्व मनाया जा रहा है। इसे लेकर कई कथाएं हैं। जब वरदान देकर भगवान विष्णु राजा बली के पहरेदार बन गए उसे वक्त देवी लक्ष्मी ने बली को रक्षा सूत्र बांध कर अपने पति को उपहार रूप में वापस मांगा था। भगवान श्री कृष्ण को द्रौपदी राखी बांधती थी। शची द्वारा इंद्र को राखी बांधने का भी प्रसंग पौराणिक गाथाओं में मिलता है। यह पर्व भारत नेपाल आदि देशों में मनाया जाता है, जहां बहनों के अलावा ब्राह्मण भी अपने यजमानों को रक्षा सूत्र बांधते हैं।

हर वर्ष सावन पूर्णिमा को रक्षाबंधन का पर्व मनाया जाता है। इस बार श्रावण पूर्णिमा और सोमवार के विशेष संजोग के साथ यह पर्व मनाया गया। हालांकि यह पर्व भाई बहन के अटूट स्नेह का पर्व है लेकिन विगत कुछ वर्षों से इसमें ज्योतिषीय दखल बढ़ती दिखाई दे रही है। इस वर्ष रविवार-सोमवार रात 3:05 से पूर्णिमा की तिथि आरंभ हो गई थी लेकिन सोमवार दोपहर 1:33 तक भद्रा काल होने की वजह से ज्योतिषियों ने इसके बाद राखी बांधने की सलाह दी थी। इसलिए अधिकांश बहनों ने दोपहर बाद ही रक्षाबंधन का पर्व मनाया। सोमवार को प्रदोष काल में सज धज कर बहनों ने थाल सजाई। भाइयों की आरती उतारी। उन्हें तिलक लगाया और फिर उनकी कलाइयों में रेशम की डोरी बांध दी। भाइयों का मुंह मीठा कराया गया और भाइयों ने भी अपने सामर्थ्य के अनुसार बहनों को उपहार दिया, साथ ही आजीवन उनकी रक्षा करने का वचन दिया।

सोमवार को सर्वार्थ सिद्धि योग और रवि योग के साथ रक्षाबंधन का पर्व मनाया गया। चूंकि भद्रा काल को अशुभ माना जाता है इसलिए दोपहर 1:30 के बाद से रात 9:00 बजे तक रक्षाबंधन का पर्व मनाया गया। रक्षाबंधन पर बच्चों में खूब उत्साह दिखा। उनके लिए तो यह रोचक पर्व है ही। वहीं इस दिन भाइयों ने अपनी बहनों की रक्षा का वचन दिया लेकिन बात तो तब बनेगी जब संकट में फंसी हर एक लड़की को इसी तरह बहन मानकर उसकी रक्षा की जाए। अकेली लड़की को अवसर नहीं दायित्व माना जाए। तभी रक्षाबंधन सार्थक होगा।

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