
खैरागढ़–छुईखदान–गंडई अंतर्गत शहीदों की धरती छुईखदान ने एक बार फिर साबित कर दिया कि यह नगर केवल इतिहास की स्मृति नहीं, बल्कि अधिकारों की लड़ाई का जीवंत केंद्र है। 9 जनवरी 1953 के ऐतिहासिक गोलीकांड की 73वीं बरसी पर शहादत दिवस के अवसर पर जहां हजारों दीप प्रज्ज्वलित कर शहीदों को श्रद्धांजलि दी गई, वहीं जिला बनने के बाद भी हो रही उपेक्षा के खिलाफ लोगों का आक्रोश खुलकर सामने आया।शहादत दिवस के मौके पर शहीद गार्डन 5100 दीपों की रोशनी से जगमगा उठा। इस आयोजन की जिम्मेदारी स्कूल और कॉलेज के छात्र-छात्राओं ने संभाली। स्वामी आत्मानंद स्कूल सहित विभिन्न शिक्षण संस्थानों के विद्यार्थियों ने पूरे परिसर को दीपों से सजाया। नगरवासियों ने एक-एक कर दीप प्रज्ज्वलित कर शहीदों को नमन किया और पृथक विधानसभा की मांग को लेकर संघर्ष जारी रखने का संकल्प लिया।छुईखदान वही नगर है, जहां आज़ादी के बाद तहसील और ट्रेज़री हटाने के विरोध में शांतिपूर्ण आंदोलन के दौरान जय स्तंभ चौक पर निहत्थे नागरिकों पर गोलियां चली थीं। इस गोलीकांड में पांच निर्दोष नागरिक शहीद हुए थे। तभी से यह नगर शहीद नगरी के नाम से जाना जाता है। 73 साल बाद भी क्षेत्र के लोगों का कहना है कि शहादत की पीड़ा आज भी जस की तस बनी हुई है।3 सितंबर 2022 को खैरागढ़–छुईखदान–गंडई को मिलाकर नया जिला तो बना, लेकिन दो वर्ष बीतने के बाद भी छुईखदान को न तो प्रमुख जिला कार्यालय मिले और न ही पृथक विधानसभा का दर्जा। इसी उपेक्षा को लेकर अब जन असंतोष लगातार गहराता जा रहा है।शहादत दिवस पर युवाओं की भागीदारी और आसपास के क्षेत्रों साल्हेवारा, बकरकट्टा, ठाकुरटोला, बुंदेली, उदयपुर और गंडई से पहुंचे लोगों की मौजूदगी ने साफ कर दिया कि छुईखदान अब अपने अधिकारों के लिए निर्णायक संघर्ष के रास्ते पर है। पृथक विधानसभा की मांग अब केवल मांग नहीं, बल्कि एक व्यापक जनआंदोलन का रूप ले चुकी है।




