
स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देने और उन्हें बाजार उपलब्ध कराने के उद्देश्य के साथ आरंभ स्वदेशी मेला का पूरी तरह व्यवसायी करण हो चुका है। चंद हाथों में सिमट चुका यह मेंला अब राजनीति का अखाड़ा तो बन ही चुका है तो वही इसके कर्ताधर्ता मेले के नाम पर भारी मुनाफा कमा रहे हैं। व्यापारियों से किराए के नाम पर भारी भरकम किराया वसूला जा रहा है। यही कारण है कि छोटे-मोटे व्यापारी यहां दुकान लगाने की कल्पना भी नहीं कर सकते । हर साल की तरह महाराष्ट्र अकोला से भी खानाबदोश व्यापारी घरेलू सजावटी सामान लेकर स्वदेशी मेला में दुकान सजाने की उम्मीद से बिलासपुर पहुंचे थे। उनके पास करीब 12 से 15 लख रुपए का समान है। मुंह मांगा किराया न देने पर उन्हें स्वदेशी मेला में दुकान लगाने की अनुमति नहीं मिली, जिससे निराश यह व्यापारी सड़क पर रात गुजारने को मजबूर है, लेकिन उन्हें यहां भी कारोबार करने नहीं दिया जा रहा। प्रशासन और पुलिस वाले इन्हें परेशान कर रहे हैं। इन लोगों ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा कि उनके पास खाने तक के पैसे नहीं बचे हैं। ना ही इतने पैसे बचे हैं कि वे अपने घर वापस लौट सके।

सड़क पर 12 से 15 लाख रुपए का समान है जिसके चोरी होने का भी अंदेशा है ।बिलासपुर आकर वे बुरी तरह फंस चुके हैं ।जाहिर है स्वदेशी मेला अपना उद्देश्य खो चुका है। जिन लोगों को बाजार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से इसकी शुरुआत की गई थी उन्हें ही नजर अंदाज कर यहां बड़े-बड़े बिल्डर और कारोबारी को स्टॉल उपलब्ध कराए गए हैं , और इसके बदले में मुनाफा कमाया जा रहा है, जबकि सत्कार का यह उद्देश्य कभी नहीं रहा।

कह सकते हैं कि स्वदेशी मेला गलत हाथों में चला गया है और इसका पूरी तरह से व्यवसायी कारण हो चुका है। इधर अकोला से आए छोटे व्यापारी बेहद परेशान है। परिवार के मुखिया के अलावा छोटे-छोटे बच्चे भी इसमें शामिल है। 20 से 25 लोगों का कुनबा वापस लौट सके इसलिए वे कुछ कारोबार कर लेना चाहते है लेकिन इन्हें यह भी नहीं करने दिया जा रहा। दुख का विषय यह है कि उनकी सुनने वाला कोई नहीं। जाहिर है इससे बिलासपुर की छवि ही खराब हो रही है।




