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हाईकोर्ट का बड़ा फैसला : ठेकेदार को अतिरिक्त मुआवजा देने का आदेश, पीड़ित परिवार की न्याय की लड़ाई ने पकड़ा जोर…

बिलासपुर: बिलासपुर रेलवे हादसे में दिवंगत प्रताप वर्मन के परिवार को न्याय दिलाने की जंग अब अदालत से लेकर सड़क तक गूंज रही है। हाईकोर्ट ने ठेकेदार को 5 लाख रुपये का अतिरिक्त मुआवजा देने का आदेश सुनाया है। इसके बाद परिवार को अब तक शासन स्तर पर 5 लाख और अन्य मदों को मिलाकर कुल 26 लाख रुपये मिलने की संभावना बन रही है। लेकिन नौकरी और समान न्याय की मांग पर परिवार और समर्थक संगठन अब भी आंदोलित हैं। रेलवे कार्य के दौरान करंट लगने से हुई प्रताप वर्मन की दर्दनाक मौत ने परिवार को गहरे अंधकार में धकेल दिया। 11 माह के मासूम बेटे और बेसहारा पत्नी के लिए अब यही सवाल है कि क्या उनके हिस्से में केवल मुआवजे की राशि आएगी या फिर सरकार नौकरी भी देगी।हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान साफ कहा कि ठेकेदार की लापरवाही से यह हादसा हुआ, इसलिए उसे भी जिम्मेदारी उठानी होगी। अदालत ने अतिरिक्त 5 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश जारी किया। इस फैसले के बाद कुल मुआवजे की राशि लगभग 26 लाख रुपये तक पहुँच सकती है।परिवार का दर्द यह है कि सरकार ने शुरुआत में सिर्फ 5 लाख रुपये देने का फैसला किया। नौकरी की मांग पर कैबिनेट मंत्री जसवंत कुमार ने बिना गहन चर्चा के कह दिया कि नौकरी संभव नहीं है। इस जवाब ने पीड़िता की उम्मीदों को गहरी चोट पहुंचाई।खुशबू वर्मन ने वीडियो कॉल में मंत्री को बताया कि परिवार पूरी तरह बेसहारा है और उनके बच्चे की परवरिश कैसे होगी। मंत्री ने भले ही बच्चे को गोद लेने और उसकी परवरिश की बात कही हो, लेकिन नौकरी से साफ इंकार कर दिया।इस मामले में बसपा नेता इन्दु बंजारे और भीम आर्मी के प्रदेश अध्यक्ष राजकुमार जांगड़े भी खुलकर परिवार के समर्थन में आ गए हैं। उनका कहना है कि यदि न्यायधानी कहलाने वाले बिलासपुर में गरीब परिवार को न्याय न मिला, तो यह लोकतंत्र और संविधान दोनों के लिए कलंक होगा। संविधान के अनुच्छेद 14 का हवाला देकर परिवार ने कहा कि सभी नागरिकों को समान अधिकार प्राप्त हैं। सवाल उठाया गया कि जब गौरव अग्रवाल को सड़क हादसे में 50 लाख रुपये मुआवजा मिल सकता है, तो प्रताप वर्मन के परिवार को महज़ पाँच लाख पर क्यों टाल दिया गया।परिवार और संगठनों का आरोप है कि सरकार जाति और वर्ग देखकर भेदभाव कर रही है। उनका कहना है कि जब कांग्रेस शासनकाल में शहीद महेंद्र कर्मा और रविंद्र चौबे के बेटों को डिप्टी कलेक्टर की नौकरी मिल सकती है, तो मजदूर वर्ग के बेटे को क्यों नज़रअंदाज़ किया जा रहा है।फिलहाल हाईकोर्ट के ताज़ा आदेश से परिवार को कुछ राहत जरूर मिली है, लेकिन उनकी कानूनी और सामाजिक लड़ाई जारी है। परिवार का कहना है कि जब तक सरकारी नौकरी और कम से कम पचास लाख रुपये मुआवजा नहीं मिलेगा, तब तक वे संघर्ष जारी रखेंगे। अब सबकी नज़र सरकार की अगली प्रतिक्रिया पर टिकी है।

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