
एक तरफ सरकार किसानों की आमदनी बढ़ाने के दावे कर रही है, वहीं दूसरी ओर ज़मीनी सच्चाई इन दावों की हवा निकाल रही है। जिले के धान संग्रहण केंद्रों का हाल बेहाल है। रोजाना हो रही बारिश के बीच खुले में रखा धान भीगकर खराब हो रहा है, और अधिकारी सिर्फ तमाशा देख रहे हैं। कई संग्रहण केंद्रों में सैकड़ों क्विंटल धान खुले आसमान के नीचे पड़ा है। कुछ जगहों पर तिरपाल बिछाकर खानापूरी की गई है, लेकिन लगातार हो रही बारिश से उसका भी कोई असर नहीं पड़ रहा।

नमी और भीगने के कारण धान में सड़न शुरू हो गई है, जिससे किसानों को भारी नुकसान का खतरा है।सबसे बड़ी समस्या उठाव की धीमी प्रक्रिया है। ट्रांसपोर्ट की कमी, गोदामों तक ढुलाई की सुस्त व्यवस्था और अधिकारियों की उदासीनता ने हालात और बिगाड़ दिए हैं। किसान लगातार शिकायत कर रहे हैं, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो रही। धान खरीदा तो गया, लेकिन उसकी सुरक्षा के नाम पर कुछ नहीं किया गया।मौसम विभाग की चेतावनी पहले से जारी थी, इसके बावजूद संग्रहण केंद्रों पर इंतज़ाम न के बराबर हैं।

सवाल यह उठता है कि जब प्रशासन को बारिश की आशंका थी, तो पहले से तैयारी क्यों नहीं की गई? अब अनाज सड़ रहा है, और इसका सीधा असर किसानों के साथ-साथ सरकारी व्यवस्था की साख पर भी पड़ रहा है।अगर यही हाल रहा, तो आने वाले दिनों में भारी मात्रा में धान खराब होगा और उसकी भरपाई किसानों को अपने खून-पसीने की कमाई से करनी पड़ेगी। प्रशासन को अब देर किए बिना उठाव की प्रक्रिया तेज करनी होगी, ताकि और नुकसान को रोका जा सके – वरना ये लापरवाही एक और किसानी संकट को जन्म दे सकती है।




