
शिक्षा सत्र शुरू हुए एक महीने से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन जिले के कई सरकारी स्कूलों में अब तक बच्चों को पाठ्यपुस्तकें नहीं मिल पाई हैं। राज्य सरकार ने 30 जून तक सभी स्कूलों में किताबें पहुंचाने का दावा किया था, लेकिन जमीनी हकीकत इसके ठीक उलट है। बच्चों को पुरानी किताबों से पढ़ाई करनी पड़ रही है या फिर कुछ छात्र बिना किताबों के ही क्लास अटेंड कर रहे हैं। प्राथमिक और माध्यमिक शालाओं में अध्ययनरत विद्यार्थियों को विज्ञान, गणित और सामाजिक विज्ञान जैसे प्रमुख विषयों की किताबें अब तक नहीं मिली हैं। इससे न केवल बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है बल्कि शिक्षकों को भी अध्यापन कार्य में काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। स्कूल शिक्षा विभाग की लापरवाही बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ जैसा बन गई है। किताबों की भारी कमी स्पष्ट रूप से सामने आई। सरकार द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के दावों के बावजूद बच्चों को बुनियादी सामग्री उपलब्ध नहीं कराई जा सकी है। यह न केवल प्रशासनिक उदासीनता को दर्शाता है बल्कि शिक्षा के प्रति सरकार की प्राथमिकता पर भी सवाल उठाता है। इस विषय पर जब जिला शिक्षा अधिकारी विजय टांडे से बातचीत की गई तो उन्होंने बताया कि किताबों की छपाई अभी प्रगति पर है और जैसे-जैसे किताबें तैयार हो रही हैं, उन्हें स्कूलों में भेजा जा रहा है। उन्होंने शीघ्र समाधान का दावा तो किया, लेकिन मौजूदा हालात से साफ है कि कार्य की रफ्तार बच्चों की जरूरतों के मुकाबले बेहद धीमी है। शिक्षकों की कमी भी एक गंभीर समस्या बनी हुई है। हाल ही में युक्तियुक्तकरण प्रक्रिया के तहत शिक्षकों की नियुक्ति और समायोजन का दावा किया गया था, लेकिन 10 प्रतिशत से अधिक शिक्षक अब तक ज्वाइन नहीं कर पाए हैं। किताबों की कमी और शिक्षकों की अनुपस्थिति ने मिलकर सरकारी स्कूलों में शिक्षा व्यवस्था को चरमरा दिया है। इसके चलते पालकों और समाज में शिक्षा विभाग के प्रति गहरा आक्रोश व्याप्त है।




