
नेकी की दीवार योजना का उद्देश्य गरीब और जरूरतमंद लोगों को साफ-सुथरे कपड़े उपलब्ध कराना था। इस योजना के तहत लोग अपने पुराने लेकिन उपयोगी कपड़े दीवार पर टांगते थे, जिससे कोई भी जरूरतमंद व्यक्ति उन्हें ले सकता था। योजना की शुरुआत उत्साह और समाजसेवा की भावना के साथ हुई थी, लेकिन समय के साथ इस दीवार की चमक फीकी पड़ गई है। नेकी की दीवार गंदगी की दीवार में तब्दील हो गया।शुरुआत में लोग स्वेच्छा से अच्छे कपड़े लाकर टांगते थे और जरूरतमंद उन्हें सम्मानपूर्वक लेते थे। लेकिन धीरे-धीरे वहां पुराने, फटे और पहनने लायक नहीं रहने वाले कपड़े फेंके जाने लगे। लोगों ने कूड़ा-कचरा भी वहीं डालना शुरू कर दिया। इस अव्यवस्था की ओर न तो नगर निगम के अधिकारियों ने ध्यान दिया और न ही सफाई कर्मचारियों ने।

नतीजा यह हुआ कि नेकी की दीवार एक कूड़ा-कचरा स्थल बन गई। उद्देश्य था कि आसपास रहने वाले या बसों के ईर्द-गिर्द भीख मांगने वाले जरूरतमंद लोग वहां से कपड़े लेकर अपनी आवश्यकता पूरी कर सकें। शुरू में योजना सफल भी रही और लोगों में इसके प्रति जागरूकता दिखी, लेकिन धीरे-धीरे यह अभियान ठहर गया। अब हालात यह हैं कि जिस जगह पर दयालु लोग अपने कपड़े छोड़ते हैं, वहां कुत्ते, सुअर और आवारा मवेशी कूड़े-कचरे के बीच मुंह मारते नजर आते हैं।

कपड़ों का इतना ढेर लग चुका है कि जरूरतमंदों को भी उसमें से उपयोगी चीजें ढूंढ पाना मुश्किल हो गया है। गंदगी और बदबू के लोगों का पास से गुजरना मुश्किल हो गया है। बिलासपुर नेहरू चौक के पास स्थित नेकी की दीवार गंदगी की दीवार में तब्दील हो गई है इसका कारण लोगों की जागरूकता भी है लोग अनदेखी कर वहां कचरा फैला रहे हैं किसी भी योजना को नियमबद्ध तरीके से चलने के बजाय उसमें लापरवाही बरती जाती है।

जितनी अनदेखी प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा की जा रही है उतनी ही अनदेखी उन जरूरतमंद लोगों द्वारा भी की जा रही है जो यहां पर कपड़ा लेने आते हैं और गंदगी फैला कर जाते हैं। स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि नगर निगम को इस ओर तत्काल ध्यान देना चाहिए। यदि नियमित निगरानी, सफाई और कपड़ों की छंटाई की व्यवस्था की जाए, तो यह योजना फिर से जरूरतमंदों के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकती है। वरना ‘नेकी की दीवार’ एक अच्छी सोच होते हुए भी उपेक्षा की भेंट चढ़ जाएगी।




