
बिलासपुर में बुधवार शाम हुई तेज बारिश ने शहर की पोल खोल दी। सरकंडा-मंगला से लेकर सिरगिट्टी तक हालात बदतर हैं। पानी सिर्फ सड़कों तक नहीं रहा, अब घरों में घुसने लगा है। सिरगिट्टी के आदर्श नगर, महिमा नगर, चिंगराजपारा सहित आसपास के इलाकों में बाढ़ जैसी स्थिति बन गई है। लोग रातभर घरों से पानी निकालते रहे। वहीं सरकंडा, मंगला और बसंत विहार जैसे क्षेत्रों में ड्रेनेज और बिजली व्यवस्था ने फिर से घुटने टेक दिए। सिरगिट्टी क्षेत्र के आदर्श नगर और महिमा नगर में बारिश का पानी बस्तियों में भर गया।

जल निकासी का कोई इंतजाम नहीं होने के कारण नालियों का गंदा पानी घरों के अंदर घुस गया। चिंगराजपारा और उसके आसपास के इलाकों में तो लोग रातभर बाल्टियों से पानी निकालते नजर आए। बच्चे, बुजुर्ग सभी बाढ़ जैसे हालात में फंसे रहे।उधर सरकंडा के बंधवापारा, चौबे कॉलोनी, बसंती विहार और कपिल नगर में भी नाले का पानी उफान पर आ गया। अंडरग्राउंड पार्किंग से लेकर बेडरूम तक पानी भर गया। स्कूल, दुकानों, अस्पताल तक इसकी चपेट में आ गए। बारिश के दो घंटे के अंदर पूरा इलाका पानी में डूब गया।

स्थानीय पार्षदों ने इसे प्रशासन की गंभीर लापरवाही बताया।मंगला क्षेत्र में वार्ड 13 और 14 सबसे ज्यादा प्रभावित रहे। शुभम विहार, गंगा नगर, शिक्षक कॉलोनी जैसी रिहायशी बस्तियों में जलजमाव के कारण सड़कों पर निकलना भी मुश्किल हो गया। लोग बाढ़ की तरह अपने बच्चों और सामानों को लेकर सुरक्षित जगहों की ओर भागते नजर आए। कई घरों में इन्वर्टर और इलेक्ट्रिक उपकरण खराब हो गए।इन सबके बीच सबसे शर्मनाक पहलू यह रहा कि बिजली विभाग पूरी तरह फेल साबित हुआ।

हर साल मेंटेनेंस के नाम पर करोड़ों खर्च होने के बावजूद बुधवार की शाम से लेकर गुरुवार दोपहर तक शहर अंधेरे में डूबा रहा। उमस भरी गर्मी में लोगों ने बिना पंखे-कूलर के रात बिताई। कई जगह शॉर्ट सर्किट और टूटे तारों ने खतरा और बढ़ा दिया।स्थानीय रहवासी सिस्टम से बुरी तरह नाराज हैं। सिरगिट्टी से लेकर सरकंडा और मंगला तक एक जैसी कहानी है — पानी, कीचड़, अंधेरा और प्रशासन की चुप्पी।

लोगों का कहना है कि जब हर साल ऐसा ही होना है तो फिर करोड़ों खर्च करने का क्या औचित्य है? न नाला पूरा हुआ, न बिजली सुधरी और हर बार भुगतना जनता को पड़ता है। बिलासपुर की ये तस्वीर किसी आकस्मिक आपदा की नहीं, बल्कि एक योजनाबद्ध लापरवाही की है। जल निकासी और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं पर करोड़ों खर्च होते हैं, लेकिन जमीनी सच्चाई वही की वही है। अब सवाल ये है कि कब सुधरेगा सिस्टम, और कब मिलेगा जनता को उसका हक।




