
लिंगियाडीह क्षेत्र में घर बचाने की लड़ाई अब शासन-प्रशासन के लिए बड़ा सवाल बनती जा रही है। पिछले 80 दिनों से ज्यादा समय से महिलाएं, बुजुर्ग और परिवार धरने पर बैठे हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकल पाया है। इस बीच पूर्व विधायक, पार्षद और स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने प्रशासन की नीतियों पर सीधा हमला बोला है। बसपा के पूर्व विधायक इंजीनियर रामेश्वर खरे ने धरना स्थल पहुंचकर आंदोलन को खुला समर्थन दिया। उन्होंने कहा कि यहां रहने वाले लोग कोई बाहरी नहीं हैं, बल्कि वर्षों पहले आकर बसे हैं और शासन ने खुद पट्टा देने की मंशा से उनसे शुल्क भी वसूला था। ऐसे में अब उन्हें बेदखल करने की कोशिश करना पूरी तरह अन्यायपूर्ण है।रामेश्वर खरे ने कहा कि जब तक सरकार प्रभावित परिवारों के लिए सुनिश्चित और स्थायी वैकल्पिक व्यवस्था नहीं करती और उनकी जरूरत के अनुसार जमीन आवंटित नहीं करती, तब तक इस तरह की कार्रवाई बिल्कुल गलत है। उन्होंने साफ कहा कि गरीबों को सताने का काम लोकतंत्र में स्वीकार्य नहीं हो सकता।उन्होंने यह भी बताया कि 80 दिनों से लोग रोजी-रोटी छोड़कर धरने पर बैठे हैं। बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है, स्वास्थ्य बिगड़ रहा है, लेकिन शासन स्तर पर अब तक कोई सुध नहीं ली गई। ऐसी संवेदनहीनता सरकार की कार्यशैली पर बड़ा सवाल खड़ा करती है।

लिंगियाडीह पार्षद दिलीप पाटिल ने आरोप लगाया कि यह सिर्फ सड़क विस्तार का मामला नहीं है, बल्कि लोगों के घरों को तोड़कर कॉम्प्लेक्स और गार्डन बनाने की तैयारी है। उन्होंने कहा कि सड़क के लिए जितना तोड़ना था, वह पहले ही तोड़ा जा चुका है, अब बची हुई बस्तियों को निशाना बनाया जा रहा है।पार्षद दिलीप पाटिल ने यह भी कहा कि उन्हें व्यक्तिगत रूप से टारगेट किया जा रहा है। उनका कार्यालय तक तोड़ दिया गया, जबकि रेडक्रॉस मेडिकल और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के लिए अन्य वैकल्पिक स्थान उपलब्ध थे। उन्होंने आरोप लगाया कि यह कार्रवाई बदले की भावना से की जा रही है।वरिष्ठ नागरिकों ने बताया कि यह धरना गरीबों के साथ सीधा अन्याय है। वर्ष 2022 में शासन ने खुद पट्टे के नाम पर शुल्क लिया था, जो सरकार का निर्णय था। अब सरकार बदल गई है, लेकिन पुराने निर्णय की जिम्मेदारी से सरकार पीछे नहीं हट सकती। धरनारत लोगों ने साफ कहा कि तीन महीने से ज्यादा समय से कोई सुनवाई नहीं हो रही है। घर, दुकानें और रोजमर्रा की आजीविका सब कुछ उजड़ रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि जब तक सरकार घर बचाने और स्थायी आवास देने का ठोस निर्णय नहीं लेती, तब तक यह आंदोलन जारी रहेगा और शासन-प्रशासन की जवाबदेही तय कराई जाएगी।




