🟪⏭️जेसीसी-बीजेपी में सियासी कशमकश
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की भाजपा के लोकसभा चुनाव के लिए नियुक्त क्लस्टर प्रभारियों के साथ दिल्ली में हुई बैठक के 5 दिन के भीतर ही भाजपा ने आम आदमी पार्टी में सेंध लगा दी। इसके अलावा हजार पांच सौ वोटों की पहचान रखने वाली छोटी-छोटी पार्टियों के अनेक पदाधिकारी भाजपा में ले लिए गए हैं। आप पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष कोमल हुपेंडी ने इस्तीफा दिया था तब उनके ही भाजपा में जाने की चर्चा ज्यादा थी लेकिन शायद अभी शर्तें तय नहीं हो पाई हैं। या फिर उन्होंने अभी मन ही नहीं बनाया होगा। शाह की बैठक से लौटकर एक क्लस्टर प्रभारी अमर अग्रवाल ने बताया था कि उनको निर्देश मिला है कि जो लोग पार्टी में आना चाहते हैं, उनका स्वागत करें। यहां उनके निर्देश का पालन होने लगा है।
इस तोडफ़ोड़ के बाद एक बार फिर यह चर्चा गर्म हो गई है कि क्या अमित जोगी लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा में शामिल हो जाएंगे? जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ के संस्थापक पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के निधन के बाद से ही पुत्र अमित जोगी ने पार्टी को फिर से खड़ा करने की बड़ी कोशिश की लेकिन विधानसभा चुनाव में आए नतीजे से यह साफ हो गया कि उसका भविष्य कैसा होगा। डॉ. रेणु जोगी पहले यह बता चुकी हैं कि कांग्रेस में पार्टी के विलय की चर्चा चली थी। बात इसलिए अटक गई क्योंकि बाकी सब के लिए सहमति तो थी लेकिन अमित को शामिल करने को लेकर कांग्रेस में एक राय नहीं थी। जेसीसी को खड़ा करने वाले ज्यादातर नेता अब पार्टी का साथ छोड़ चुके हैं। स्व. जोगी के जाने के बाद उनके बेहद करीबी धर्मजीत सिंह अब भाजपा विधायक हैं।
मरवाही उपचुनाव में लडऩे का मौका नहीं मिलने पर जेसीसी ने भाजपा प्रत्याशी डॉक्टर गंभीर सिंह को समर्थन दे दिया था। बीते विधानसभा चुनाव में भी जेसीसी का भूपेश बघेल के नेतृत्व वाली कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने का मकसद पूरा हुआ। मगर उसे खुद नोटा जितने वोट भी नहीं मिल पाए। सूत्र बता रहे हैं कि इस नतीजे से पार्टी में बेचैनी महसूस की जा रही है और भाजपा में विलय की मांग हो रही है। अमित कह चुके हैं कि क्या करना है यह वक्त आने पर तय करेंगे। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय से मिलकर वे उनको जीत की बधाई दे चुके हैं, पर बीते 8 जनवरी को शाह से उनकी मुलाकात के बाद चर्चा और तेज हुई है। लोग मान रहे हैं कि इन भेंट मुलाकातों का कोई न कोई मुकाम होगा।
मगर फैसला आसान नहीं है। पार्टी में जो लोग भी आज रह गए हैं उनमें से ज्यादातर कार्यकर्ता ऐसे हैं जो स्वर्गीय अजीत जोगी को जननायक और मसीहा मानते रहे और अमित जोगी से उनकी विरासत आगे बढ़ाने की उम्मीद करते हैं। जो लोग आज साथ हैं वे सब के सब भाजपा में जाना पसंद करें या जरूरी नहीं।
दूसरा पहलू बीजेपी का है। पार्टी के रणनीतिकारों को यह तय करना है कि जोगी की पार्टी का विलय ठीक रहेगा या उसका अलग अस्तित्व बनाए रखने में नफा होगा।
विनोद कुशवाहा
एडिटर
G news
बिलासपुर





