सच्चे समाज सुधारक थे गुरूदेव सहसराम देव जी
हमारे जीवन में कई लोगौं के व्यक्तित्व का प्रभाव रहता है। जिन लोगों से हम मिलते है, हम जिनके संपर्क में रहते है, उनकी बातों का प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है, लेकिन कुछ ऐसे व्यक्ति भी होते है जिनके बारे में सुनकर ही आप उनसे प्रभावित हो जाते है। हमारे लिए ऐसे ही रहे है परमपूज्य गुरूदेव सहसराम जी।
परमपूज्य गुरूदेव सहसराम जी का जन्म 12 जून 1855 को छत्तीसगढ़ जिला जांजगीर चम्पा में एक छोटा सा गाँव जगमहन्त में अंधकार में प्रकाशपुंज की तरह हुआ था । इनके पिताजी का नाम श्री धजाराम तथा माता जी का नाम श्रीमती कंचन देवी था। माता पिता की इच्छानुसार उनका विवाह ग्राम पुटपुरा के सम्पन्न समृद्ध श्री सुगन्धी मंडल के पुत्री पुलकि बाई से हुआ। वे अपने परिवार में ज्येष्ठ पुत्र थे, उनके पीछे गंगाराम, हीराराम औऱ जनकराम, तीनों भाइयों, के स्वभाव से गुरूदेव जी का स्वभाव अलग ही था। सात फूट का कद,चौड़ी सीना, सिर पर पागा, धोती कुर्ता कोट, पैर में जूता, से सजा विलक्षण स्वरूप हुआ करता था। हमने उनके बारे में वरिष्टजनों से बहुत कुछ सुना है। 24 दिसम्बर का वह दिन था जब गुरूदेव बैलगाड़ी से किसी कार्यवश जांजगीर आ रहे थे तो चर्च मिशनरी के पादुरी साहब जो चर्च में क्रिसमस की तैयारी में लगे थे, उनके साथ चर्चा परिचर्चा ने गुरूदेव जी के जीवन को ही बदल दिया पादुरी साहब ने केवल इतना ही कहा कि सहस जी आपका समाज भी बहुत बड़ा समाज है जो बिखरा हुआ है जिनको समेट कर एक नई दिशा दीजिये सब कुछ ठीक हो जाएगा क्योंकि इस कार्य के लिए आप मे काबिलियत है और आप कर सकते है बस इतनी सी पादुरी साहब की बात सहसराम जी के रात की नींद छीन ली और सुबह होतें उन्होंने समर्पण भाव से सूर्यवंशी समाज के सुधार के कार्य मे अपने आप को समर्पित कर दिया। सामाजिक उत्थान के लिए गुरूदेव ने अपने टीम के साथ, जिसमें मोहगांव से मालिकराम, जांजगीर से भूखलु मंडल , महंत से गुड्डू मंडल, भैंसदा से नानक मंडल, हरदी से शिवचरण मंडल, धुरकोट से तीरथा मंडल, सुकली से कार्तिक मंडल, खोखरा से शिवभगत मंडल, पुटपुरा से सुगन्धी मंडल, धलेनी से दासु मंडल , डूड़गा से होरी मंडल,तागा से गिरधारी मंडल, कोसमन्दा से पिलन मंडल ,सरखों से पुनीराम मंडल ,मूढाली से विपत मंडल , बनारी से आशा मंडल, धाराशिव से तिहारु मंडल, घनवा से नानक मंडल,अफरीद से बैमन मंडल, भागोडीह से बैगाराम आदि ने जो प्रयास किए उससे समाज में बड़ा बदलाव आया।
गुरूदेव जी के समाजिक कार्यों की ओर जाये तो समाजिक हित में अनेकों कार्य किये,पीढ़ा पाठ, राजसी यज्ञ,पर्वतदान,संत विनोवाभावे द्वारा चलाये जा रहे भूमिदान आंदोलन में चढ़ बढ़ कर सहभागिता निभाते हुए10 एकड़ जमीन दान पर दिये थे, स्कूल के लिए भी भूमि दान किये थे, अपने स्वयं के खर्चे से 6 एकड़ जमीन पर ग्राम जगमहंत में शंकरबन्द,,नामक तालाब खुदाई कराये। गुरूदेव जी सर्व गुण सम्पन्न थे जहाँ एक ओर क्षेत्र क़े सभी राजघराना से करीबी सम्बंध था साथ ही अन्य समाज के प्रबुद्धजनों से मित्रवत व्यवहार था वही लोकप्रियता के क्षेत्र में भी अपनी एक अलग पहचान बनाये रखें थे,उन्होंने विधान परिषद की चुनाव भी लड़ा था,उस समय मतदान करने के लिए वही पात्र होते थे जिनके पास 50 एकड़ कास्तकारी हो। गुरूदेव जी राज वैद्य भी थे, उनके पास उस दौर में एक पहट जानवर भी हुआ करता था।
परमपूज्य गुरूदेव जी का परवरिश एक संपन्न परिवार में होने के बावजूद भी उनका पूरा जीवन सादगी और सामाजिक उत्थान के लिए समर्पित रहा। वे अपनी अंतिम सांस तक सरल जीवनशैली और विनम्र स्वभाव के चलते आम लोगों से गहराई से जुड़े रहे। उनसे जुड़े ऐसे कई किस्से है, जो उनकी सादगी की मिसाल है। सन 1924 में सहसराम सभापति के रुप में खोखरा भांठा में एक सामाजिक महासभा का आयोजन किया था, औऱ वहीं समाजिक क्रांति का प्रारूप तैयार किया गया था ,उसी मंच में सहसराम को,समाजिक गौरव ,समाजिक क्रांति के मूल प्रणेता,के नाम से अलंकृत किया गया। समाज को पोषित, पल्लवित व परिष्कृत करना उनके मन में रचा-बसा था। उनके जीवन को एक ऐसे समाज के निर्माण के प्रयासों के लिए जाना जाता है, जहां सभी लोगों तक संसाधनों का समान रूप से वितरण हो और सामाजिक हैसियत की परवाह किए बिना उन्हें अवसरों का लाभ मिले। उनके प्रयासों का उदेश्य समाज में पैठ बना चुकी कई असमानताओं को दूर करना भी था।अपने आदर्शों के लिए गुरूदेव जी की प्रतिबध्दता ऐसी थी कि उस कालखंड में उनके समक्ष समस्याओं का अंबार लगा हुआ था, चाहे शिक्षा का क्षेत्र हो या अन्य क्षेत्र जैसे कि आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक आदि। सम्मानपूर्वक जीवन जीने के लिए जो भी कदम उठाते हर कदम जोखिम व अवरोध भरा होता था। परिस्थितियां विपरीत थी, किस्मत के सितारे गर्दिश में थे, अभाव, अपमान, बेबसी, लाचारी नियति बन चुकी थी और एक सामान्य जीवन जीना दूभर था, लेकिन समस्याओं के चक्रव्यूह को भेदते हुए एवं सभी चुनौतियों को पार करते हुए उन्होंने सम्मान की लड़ाई लड़े एवं सफलता भी अर्जित किए और जीवनभर समाज के उत्थान के लिए काम करते रहे, लेकिन मौत तो सच्चाई है समय के साथ 97 साल लम्बी जीवन जीने के साथ ही 8 फरवरी 1952 को महामानव चिरनिद्रा में सो गये। परमपूज्य गुरूदेव जी अपने जीवन में अंतिम क्षणों में समाज के लिए सन्देश दिया था कि मेरे जाने के बाद भी समाज में ऐसे ही एकता बनी रहे।समाज न टूटे, न बिखरे, कलांतर में उसी खोखरा भांठा में एक विशाल भूमि अधिग्रहण कर समाज के युवाओं के द्वारा उसी जगह पर दिनांक 22 सितम्बर 2020 को हर्षोल्लास के साथ गुरूदेव जी की दिव्य एवं भव्य प्रतिमा स्थापित किया गया, जिसे सूर्यांश धाम के नाम से जाना जाता है।
आज परमपूज्य गुरूदेव सहसराम जी की पुण्यतिथि है। एक व्यक्ति के रूप में गुरूदेव के जीवन से बहुत कुछ सीखने को मिलता है। अनेक लोगों के जीवन में गुरूदेव जी का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष योगदान रहा है। इसके लिए हम उनका सदैव आभारी रहेंगे एवं पुण्यतिथि पर श्रध्दासुमन अर्पित करते हुए शत्-शत् नमन।
अखिल भारतीय सूर्यांश शिक्षा उत्थान समिति
सूर्यांश विद्यापीठ
सूर्यांश अकेदमी
छत्तीसगढ़, भारत





