जिले की जीवनरेखा अरपा का जल स्तर घटने के साथ ही उस पर जलकुंभी का फैलाव तेजी से हो रहा है। तटवर्ती क्षेत्रों में जल स्तर बनाए रखने में नदी की अहम भूमिका है। इसके बावजूद अरपा को बचाने की बजाय नगर निगम उसे मारने पर तुला हुआ है। शिव घाट से छठ घाट तक 11 बड़े नालों से करीब 108 एमएलडी गंदा पानी हर दिन अरपा को प्रदूषित कर रहा है। नदी में ताजा खतरा जलकुंभी का है। छठघाट से लेकर गुरुनानक देव दयालबंद पुल तक नदी जलकुंभी से पट चुकी है। जलकुंभी का फैलाव गोंड़पारा की ओर हो रहा है। जलकुंभी जल और जल स्तर दोनों को नुकसान पहुंचा रही हैं। साल 2019 में तत्कालीन कलेक्टर की पहल पर प्रशासन और फिर जनसहयोग से छठघाट से जलकुंभी निकाली गईं। इसके बाद अभियान ठप हो गया। जलकुंभी में 94 प्रतिशत पानी और 6 प्रतिशत अन्य तत्व होते हैं। जलकुंभी एक ऐसी वनस्पति है जिसे जितना ज्यादा गर्मी मिलती है, वह उतनी ही तेजी से विकसित होता है। जलकुंभी पानी के स्त्रोत को सुखा देता है। पानी में तीन प्रकार की वनस्पतियां पाई जाती हैं। इसमें ऊपर तैरने वाली जलकुंभी और नीचे में एजोला पाए जाते हैं। एजोला पानी के अंदर के आक्सीजन को नियंत्रित करता है। एजोला भी सौर ऊर्जा से ग्रोथ करता है। जलकुंभी के ऊपर होने के कारण नीचे तक सौर ऊर्जा नहीं पहुंच पाती है। इसके कारण एजोला ग्रोथ नहीं कर पाता और नष्ट हो जाता है। इससे पानी के अंदर का आक्सीजन नियंत्रित नहीं हो पाता। इससे पानी के अंदर के जीव मरने लगते हैं। अब सवाल यह है कि पहले जो जलकुंभी साफ करने के लिए प्रशासन द्वारा मशीन और कुछ तकनीकी योजनाएं बनाई गई थी जिससे निरंतर अरपा की साफ सफाई होती थी यह योजना ढप क्यों हो गई है।




