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Saturday, February 28, 2026
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उत्पादन और खपत के अंतर को पाटने के लिए सिंथेटिक दूध से पटा बाजार

भारत में दूध उत्पादन और उसकी खपत के बड़े अंतर को पाटने के लिए बाजार में बिना संकोच के नकली और सिंथेटिक दूध उपलब्ध कराया जा रहा है। इस तरह से लोगों की सेहत के साथ खिलवाड़ होता है। अगर आप जरा सा अकल लगाए तो आप भी असली और नकली दूध के अंतर को आसानी से समझ सकते हैं।

कोई भी कारोबार मुनाफे के लिए किया जाता है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि मुनाफा कमाने के लिए लोगों की सेहत और आस्था से खिलवाड़ किया जाए । दुनिया में ऐसे भी कई देश हैं जहां खाने पीने की चीजों में मिलावट करने पर मौत की सजा दी जाती है। इस मामले में भारत का कानून लचीला होने से यहां मिलावट खोर आसानी से अपने मकसद में कामयाब हो रहे हैं । बाजार में ₹60 से ₹100 लीटर के बीच दूध बेचा जाता है लेकिन दूध से बने उत्पाद इस तुलना में काफी सस्ते मिलते हैं ।दूध ₹100 लीटर और 1 किलो मिल्क केक मात्र 150 रुपए में उपलब्ध है। 1 किलो घी बनाने के लिए 30 से 50 लीटर तक दूध की जरूरत पड़ सकती है। इससे आप अंदाज लगा सकते हैं कि ऐसे में घी की कीमत क्या होनी चाहिए लेकिन बाजार में ₹150 से लेकर 450 से ₹500 लीटर तक में भी घी उपलब्ध है, जिससे ही समझ में आता है कि यह घी नकली हो सकती है । बिलासपुर के खोवा मंडी में 260 रुपए किलो के दाम पर खोवा उपलब्ध है, वही ₹150 किलो मिल्क केक बेचा जा रहा है। बेचने वाले दावा कर रहे हैं कि यह बिल्कुल शुद्ध है, जबकि दूध की कीमत की तुलना में इस कीमत पर खोवा या मिल्क केक बेचना संभव ही नहीं ।

डेरी व्यवसायी कैलाश गुप्ता भी मानते हैं कि दूध की जो कीमत है उसके मद्दे नजर बाजार में ₹150 में मिलने वाले मिल्क केक की शुद्धता संदिग्ध है। हालांकि बड़े होटलों में जो महंगा मिल्क केक मिल रहा है वह पूरी तरह शुद्ध है, यह दावा भी नहीं किया जा सकता क्योंकि उनकी जांच की कोई व्यवस्था नहीं है।

बिलासपुर के बाजार में किस तरह से नकली माल खपाया जाता है और इसे लेकर कानून व्यवस्था किस कदर ढीली है इसका खुलासा अनिल तिवारी ने किया है। उन्होंने बताया कि एक पुराने मामले में 15- 20 साल बाद फैसला आया है। जांच के नाम पर केवल खाना पूर्ति की जाती है। खाद्य अधिकारी और फूड इंस्पेक्टर कभी बाजारों में दिखते ही नहीं और जांच रिपोर्ट कभी सार्वजनिक नहीं की जाती।

जाहिर है कि अधिक कीमत में दूध खरीद कर उसके बने उत्पाद कम कीमत पर बेचना तभी संभव होगा जब उसमें मिलावट की जाए। हम जो सामान खरीद कर खा रहे हैं उसमें मिलावट है या नहीं इसकी पड़ताल हम नहीं कर सकते , इसीलिए खाद्य विभाग है, लेकिन इस विभाग के जिम्मेदार लोग कहां रहते हैं और क्या करते हैं यह कोई नहीं जानता। त्योहार के दौरान एक दो दुकानों में छापा मार कर यह फिर से शीत निद्रा में चले जाते हैं । यही कारण है कि बिलासपुर में भी धड़ल्ले से नकली दूध, नकली खोवा, नकली घी और नकली दूध उत्पादों का कारोबार हो रहा है। इसमें पशुओं की चर्बी भी हो सकती है। यानी शाकाहारी जिसे शुद्ध समझ कर इस्तेमाल कर रहा है उससे उसकी आस्था भी खंडित हो रही है या नहीं यह कोई नहीं जानता।

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