भारत माता स्कूल के बगल से गुजरने वाली सड़क को बंद के विरोध में सर्व दलीय मंच ने जोन कार्यालय का किया घेराव।

चुनाव खत्म होते ही रेलवे ने एक बार फिर से भारत माता स्कूल के बगल से गुजरने वाली सड़क को बंद कर दिया है, जिसे लेकर चेतावनी देने के बाद सर्व दलीय मंच के पदाधिकारी ने जोन कार्यालय का घेराव किया, लेकिन रेलवे की हठ ऐसी की एमजीएम ने उनसे मुलाकात करना भी जरूरी नहीं समझा। बिलासपुर में कई प्रमुख केंद्रीय संस्थाएं सक्रिय हैं, जिनमें से रेलवे भी एक है। बताते हैं जब रेलवे की शुरुआत हुई थी तो यहां के दानदाताओं ने दिल खोलकर रेलवे को जमीन दान दी थी, लेकिन मौजूदा रेल अधिकारी खुद को हमेशा से शहर से अलग समझते हैं। यही कारण है कि वे एक-एक कर रेलवे क्षेत्र की सड़कों को आम लोगों की आवाजाही के लिए बंद कर रहे हैं। खासकर उन सड़कों को बंद किया जा रहा है जहां अधिकारी वर्ग रहता है। जोन ऑफिस और जीएम के बंगले के पास की सड़क के बाद भारत माता स्कूल के बगल से गुजरने वाली सड़क को भी बंद कर दिया गया।

दरअसल इसी सड़क पर रेलवे के डीआरएम और जीएम का बंगला है, उन्हें वीआईपी ट्रीटमेंट देने के लिए ही यह तुगलकी फरमान जारी किया गया। इससे हो या रहा है कि भारत माता स्कूल आने जाने वाले बच्चों को भीड़ भाड़ वाले रास्ते से गुजरना पड़ रहा है, जहां दुर्घटना की आशंका अधिक है। इसे लेकर कई संगठनों ने विरोध किया। चुनाव आयोग को भी चिट्ठी लिखी तो चुनाव तक रास्ते को खोल दिया गया, लेकिन चुनाव निपटते ही एक बार फिर से इस रास्ते को बंद कर दिया गया। जिसे लेकर चेतावनी देने के बाद मंगलवार को सर्वदलीय मंच के नेताओं ने जोन कार्यालय का घेराव किया। हालांकि यहां विरोध प्रदर्शन करने मुट्ठी भर नेता ही पहुंचे लेकिन उन्होंने रेलवे की हठधर्मिता और इस तुगलकी फरमान के खिलाफ पुरजोर आवाज बुलंद की और कहा कि रेलवे जोन को स्थानीय लोगों ने संघर्ष कर हासिल किया है। यह स्थानीय लोगों की संपत्ति है ना की रेलवे के बाहर से आए चंद अधिकारियों का साम्राज्य, जहां इस तरह के फैसले लेकर आम शहरी को परेशान किया जाए। इस पूरे मामले को लेकर रेलवे किस कदर गंभीर है इसे इससे ही समझा जा सकता है कि एजीएम ने आंदोलन कारियो से मिलना भी जरूरी नहीं समझा। इसके बाद आंदोलन कारियो ने जीएम और डीआरएम के तबादले की मांग कर डाली।

रेलवे में अक्सर बाहर से पदाधिकारी नियुक्त होते हैं जिनका स्थानीय लोगों से कोई लगाव नहीं रहता। यही कारण है कि कभी रावण दहन रोका जाता है, कभी रेलवे क्षेत्र में संचालित स्कूल और मंदिरों पर आपत्ति की जाती है तो कभी यहां की सड़कों को आम लोगों के आवाजाही के लिए बंद कर दिया जाता है। रेलवे अधिकारी शायद भूल जाते हैं कि रेलवे भी इसी देश की संपत्ति है और यह लोगों के टैक्स से ही चलती है, इसलिए आम लोगों का भी इस पर उतना ही अधिकार है। रेलवे के अधिकारी तो कुछ वर्ष बाद रिटायर हो जाएंगे लेकिन यह संपत्ति भारत के हर एक नागरिक की रही है और रहेगी, इसलिए इस तरह के तुगलकी फरमान जारी कर कटुता उत्पन्न करने की आवश्यकता शायद नहीं है। इससे पहले भी कई बार रेलवे ने इस तरह की कोशिश की। कभी स्थानीय लोगों के विरोध से रेलवे को झुकना पड़ा तो कभी रेलवे ने अपनी जिद नहीं छोड़ी। देखना होगा कि इस बार ऊंट किस करवट बैठता है।

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