
भारत की पावन धरा पर परमात्मा शिव के अवतरण का संदेश एक बार फिर मानवता को आत्म-चिंतन और आत्म-परिवर्तन की प्रेरणा दे रहा है। इस संदेश के अनुसार आज विज्ञान ने भौतिक जगत के अनेक रहस्यों को उजागर कर दिया है, परंतु मनुष्य अब भी अपने भीतर निहित अनंत आध्यात्मिक शक्तियों से अनजान है। आध्यात्मिक ज्ञान बताता है कि मनुष्य शरीर नहीं, बल्कि एक चेतन शक्ति—आत्मा है, जो शरीर का संचालन करती है और परमात्मा की संतान है।शिव जयंती को वह महान पर्व माना जाता है, जब स्वयं परमपिता परमात्मा शिव का अवतरण होता है। गीता के “यदा यदा हि धर्मस्य” श्लोक के अनुसार यही वह समय है, जब अधर्म की वृद्धि के बीच धर्म की पुनः स्थापना होती है। परमात्मा शिव को निराकार, ज्योति बिंदु स्वरूप, सर्वशक्तियों का सागर, दुखहर्ता और सुखकर्ता बताया गया है, जो जन्म-मरण से परे हैं।यह काल कलियुग के अंत का संकेत देता है—जहाँ एक ओर विनाश की प्रक्रिया, तो दूसरी ओर दैवीय गुणों की स्थापना हो रही है। संदेश में कहा गया है कि अभी नहीं तो कभी नहीं—स्वयं को पहचानें, परमात्मा को याद करें और बुराइयों का त्याग कर जीवन में सुख, शांति और पवित्रता का अनुभव करें। यह ज्ञान और राजयोग की शिक्षा व्यापक रूप से प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय द्वारा भी प्रसारित की जा रही है।




