प्रयागराज काशी विश्वनाथ धाम से हिंदू सनातन आदर्श रामलीला मंडली रेलवे क्षेत्र में रामलीला का आयोजन।

शहर में पहुची मंडली रामलीला का मंचन कर पुरातन पंरपरा को निभा रही हैं। टीवी और मोबाइल के दौर में पंरपराओं को बचाने के लिए जिले के गांवों में आज भी लोग सक्रिय हैं। गांव और शहर में आज भी रामलीला को लेकर लोगो में जिज्ञासा बना हुआ है। प्रयागराज काशी विश्वनाथ धाम से हिंदू सनातन आदर्श रामलीला मंडली रेलवे क्षेत्र में रामलीला का आयोजन कर रही है, जिसे देखने बड़ी संख्या में क्षेत्रवासी पहुंच रहे हैं।

रामायण कथा के जरिए लोगों को आदर्श संस्कार की शिक्षा दी जा रही है लेकिन प्रशासन स्थानीय निकाय और जनप्रतिनिधियों से अपेक्षित सहयोग नहीं मिलने के बाद भी वह हिंदू संस्कारों को आगे बढ़ाने काम कर रहे हैं।

रामायण के पात्रों को सजीव अपने सामने देखना एक अलग ही रोमांच होता है, रामायण महाकाव्य के संदेशों को पात्रों के जरिए मंच में दिखाने का काम हिंदू सनातन आदर्श रामलीला मंडली कर रही है। जो पिछले 7 सालों से बिलासपुर सहित अलग-अलग क्षेत्र में अपना प्रदर्शन कर रही है, 15 सदस्यी टीम में रामायण के किरदार सहित अन्य कलाकार शामिल है। तार बाहर चौक के बड़ा गिरजाघर चौक में रामलीला का प्रदर्शन नौ दिन चलेगा, जिसका समापन 18 जून को होगा। इस दौरान कलाकारों ने बताया कि हिंदू संस्कृति को आगे बढ़ाने और रामायण के संदेशों को जन जन तक पहुंचाने आयोजन किए जाते हैं। सनातन आदर्श रामलीला मंडली के डायरेक्टर धीरज कुमार खंडे जो राम की भूमिका निभाते हैं, उन्होंने बताया कि रामलीला के प्रति आज भी लोगों में जिज्ञासा और उत्साह बना हुआ है। इसके जरिए हम हिंदू संस्कृति को लोगों तक पहुंचने प्रयास कर रहे हैं। जिसमें प्रशासन का सहयोग मिल जाए तो इस काम को बड़े स्तर पर किया जा सकता है ।

मंडली की अपनी एक अलग पीड़ा है। प्रशासन और लोगों से जो सहयोग की उम्मीद होती है वह नहीं मिलता। फिर भी सनातन आदर्श को आगे बढ़ाने प्रयास किया जा रहा हैं। आयोजक ने बताया कि यह काम उनके दादा परदादा करते आ रहे हैं इस परंपरा को वह भी जीवित रखे हुए हैं लेकिन संस्थाओं, प्रशासन, स्थानीय निकाय इस इर कोई ध्यान नहीं देती, अभी तो रामलीला विलुप्ति की कगार पर हैं, सदस्यों का कहना हैं मंच पर ही रहने खाने सोने की व्यवस्था जैसे जैसे तैसे की जाती है, जबकि आसपास सरकारी स्कूल सामुदायिक भवन होते हैं लेकिन सहयोग नहीं मिलने से उन्हें मंच में ही 9 दिन गुजारने होते हैं। आयोजकों की माने तो लोगों और जनप्रतिनिधियों से सहयोग मिले तो हिंदू सनातन संस्कृति को वे बड़े रूप में जन-जन तक पहुंचा सकते हैं।

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