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Monday, March 23, 2026
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बिलासपुर रेलवे स्टेशन बना विवाद का अखाड़ा, पार्किंग को लेकर रोज हो रहे झगड़े

जोन के सबसे महत्वपूर्ण स्टेशनों में से एक बिलासपुर रेलवे स्टेशन का उन्नयन 392 करोड़ की लागत से किया जा रहा है ताकि यात्रियों को बेहतर सुविधा मिल सके। लेकिन अतिथि देवो भव की परंपरा कब की भूल चुके रेलवे के अधिकारी केवल इमारत बनाने में लगे हुए हैं। जबकि यात्रियों के साथ उनका व्यवहार बेहद खराब है । इसका सबसे बड़ा उदाहरण बिलासपुर का रेलवे स्टेशन और इसकी पार्किंग व्यवस्था है। बिलासपुर रेलवे स्टेशन भवन उन्नयन के नाम पर गेट नंबर 4 के पास लगने वाले ऑटो रिक्शा को यह कहकर हटा दिया गया कि उनकी वजह से यात्रियों को आने जाने में दिक्कत होती है लेकिन इसी जगह को प्रीमियम पार्किंग के लिए इस्तेमाल करने के लिए ठेकेदार को उपलब्ध करा दिया गया । बिलासपुर स्टेशन में इसका ठेका निमेष मिश्रा के पास है, जिसकी रेलवे की कुछ अधिकारियों से अच्छी बनती है। मिली भगत के साथ ठेकेदार और उसके कर्मचारियों द्वारा न सिर्फ यहां नियमों का उल्लंघन किया जा रहा है बल्कि यात्रियों के साथ बदसलूकी की घटनाएं हर दिन घट रही है।

प्रीमियम पार्किंग के लिए लगभग पूरे क्षेत्र को नियम विरुद्ध ठेकेदार को सौंप दिया गया है, जहां किसी और के आने का जैसे कोई अधिकार ही नहीं है। कहने को तो यहां ड्रॉप एंड गो सर्विस है लेकिन यह सिर्फ कागजों में है। स्टेशन में यात्रियों को छोड़ने आए गाड़ियों से हुज्जतबाजी करना रोज की बात है। इधर इन दिनों एक नई समस्या सामने आ रही है। कोई भी वाहन चालक अनजाने में स्टेशन परिसर और आसपास कहीं भी अपने वाहन खड़ा करता है तो फिर उसके गाड़ी को जैमर से लॉक कर दिया जाता है । लौटने पर वाहन चालक परेशान होता है और इस वजह से आए दिन विवाद की स्थिति बन रही है।

रेलवे के जिन अधिकारियों के साथ मिली भगत से यह सब हो रहा है वे इस मामले में बड़े मासूमियत से अनजान बनने का अभिनय करते हैं। रेलवे की दादागिरी बदस्तूर जारी है। रेलवे ने स्टेशन से काफी दूर तितली चौक, बुधवारी बाजार क्षेत्र तक नो पार्किंग जोन घोषित कर दिया है। लिहाजा यहां कोई भी अपने वाहन खड़ा करता है तो उसके गाड़ी को इसी तरह से लॉक कर दिया जाता है और फिर उन्हें सिविल डिफेंस विभाग के पास भेज दिया जाता है, जहां उनसे अनाप-शनाप वसूली की जाती है। बताया जाता है कि रेलवे प्रीमियम पार्किंग ठेकेदार निमेष मिश्रा को यह हक नहीं है कि वह गाड़ियों को इस तरह से लॉक करें लिहाजा रेलवे ने एक नई व्यवस्था निकाली है, जिसके तहत दीपक अग्रवाल को ठेका देते हुए उन्हें यह अधिकार दिया गया है कि वह रेलवे स्टेशन के आसपास पार्क होने वाली किसी भी वाहन को लॉक कर सकता है। इसमें उसे सिविल डिफेंस विभाग के कर्मचारियों का साथ मिल रहा है जो अब तक बिना किसी कामकाज के खाली बैठे रहते थे। ऐसे वाहन मालिकों से 200 से लेकर ₹1000 तक वसूली की जाती है। कभी-कभी तो उन्हें पर्चा भी नहीं दिया जाता।

बताते हैं कि इस वसूली का 5% सिविल डिफेंस विभाग को जा रहा है। हैरानी की बात है कि यह सब कुछ केवल रेलवे स्टेशन के आसपास ही नहीं बल्कि तितली चौक तक भी किया जा रहा है। इन दिनों शादियों का मौसम है। लोग संस्कृतिक निकेतन में वैवाहिक समारोह में शामिल होने आते हैं। यहां पार्किंग ना होने पर सड़क के किनारे वाहनों को पार्क किया जाता है। इस दौरान सिविल डिफेंस के कर्मचारी एक बार अलाउंस करते हैं । समारोह में होने की वजह से लोग उसे सुन नहीं पाते और इसके बाद विभाग के लोग गाड़ियों को लॉक कर चले जाते हैं ।वैवाहिक कार्यक्रम से जब लोग निकालते हैं तो वे गाड़ियों को लॉक पाते हैं लेकिन वहां आसपास ऐसा कोई नहीं रहता जो उन्हें इसका निदान बताएं। लिहाजा रात में लोग भटकते हैं। जो अधिकार यातायात विभाग को तक नहीं है उसे रेलवे ने अपने ठेकेदारों को दे रखा है।

जहां भी आम लोगों की आवाजाही है, वाहन पार्किंग की व्यवस्था करना संस्थान की जिम्मेदारी होती है। रेलवे की भी यह जिम्मेदारी है लेकिन पार्किंग के नाम पर इस तरह की दादागिरी शायद ही कहीं और देखने को मिलती होगी। यही कारण है कि रेलवे की यात्रा करने वाले अधिकांश लोग बुरी यादें लेकर लौटते हैं और इसमें रेलवे के एक-एक अधिकारी की मिलीभगत है। आए दिन मीडिया में छप रही खबरों के बावजूद अगर इस चलन को बढ़ावा दिया जा रहा है तो जाहिर है इसके पीछे उन अधिकारियों का कोई ना कोई निजी स्वार्थ छुपा होगा, जिन्हें प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से लाभ मिल रहा है लेकिन इस वजह से आम यात्रियों को काफी परेशानी हो रही है। रेलवे अधिकारियों की हठधर्मिता ऐसी कि इस मामले में जनप्रतिनिधियों की भी मानने को तैयार नहीं। यही कारण है कि रेलवे स्टेशन पर रोज टकराव की स्थिति नजर आती है ।

पार्किंग ठेकेदार पूरी तरह से बेलगाम और बदमिजाज हो चुके हैं जिनके कर्मचारी आए दिन लोगों से झगड़ा और मारपीट कर रहे हैं। आम यात्रियों के साथ रेलवे के कर्मचारी भी इसके शिकार होते हैं। कुछ दिन पहले लोको पायलट के साथ भी ठेकेदार के कर्मचारियों ने मारपीट की थी। बावजूद इसके रेलवे अधिकारी बेवजह तो ठेकेदार के पक्ष में यूं ही खड़े नजर न आते होंगे ।इसके पीछे जरूर कोई ना कोई स्वार्थ है। अब बड़ा सवाल यह है कि जब पूरे कुएं में ही भांग मिली हुई है तो फिर इलाज कौन करें ।

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