
रेलवे प्रशासन विकास कार्यों के नाम पर लगातार ट्रेनों को रद्द कर रहा है। लेकिन रद्द ट्रेनों की कोई समुचित वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की जा रही है। नतीजतन, जो ट्रेनें चल रही हैं उनमें जबरदस्त भीड़ उमड़ रही है।स्लीपर कोच से लेकर जनरल डिब्बों तक की हालत यह है कि लोगों को बैठना तो दूर, खड़े होना भी मुश्किल हो गया है। जनरल कोच में पैर रखने की जगह तक नहीं है। कई यात्री जान जोखिम में डालकर शौचालय और दरवाजों में बैठकर सफर कर रहे हैं।इतना ही नहीं, प्लेटफॉर्म पर ट्रेन के पहुंचते ही आरपीएफ और टीटीई की टीम जनरल बोगियों के पास डट जाती है। खानापूर्ति के नाम पर यात्रियों को डराया-धमकाया जाता है और उनसे वसूली की जाती है।भीड़ से परेशान यात्रियों को न तो सुरक्षा मिल रही है और न ही सुविधा।

रेल प्रशासन अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ रहा है और वर्दीधारी कर्मचारी इस आपदा में अवसर तलाशने में लगे हैं।ऐसे हालात में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या रेलवे प्रशासन को इस अव्यवस्था का अंदाजा नहीं है? या फिर यात्रियों की मजबूरी का फायदा उठाने का ये एक सोचा-समझा तरीका है।रेलवे की बदइंतज़ामी और कर्मचारियों की मनमानी से आम यात्री बेहाल हैं। जरूरत है कि रेलवे प्रशासन इस गंभीर मुद्दे पर तुरंत ध्यान दे और वैकल्पिक व्यवस्थाओं के साथ वसूली पर रोक लगाए। वरना आने वाले दिनों में हालात और भी बिगड़ सकते हैं।




