
भीषण गर्मी में बिना वातानुकूलन सुविधा के काम कर रहे लोको पायलटों की परेशानियों को लेकर एआईएलआरएसए ने एक बार फिर मुँड़ी गरम प्रदर्शन किया। संगठन के अनुसार, इस आंदोलन की शुरुआत वर्ष 2008 में हुई थी और 2018 में बिलासपुर से मुँड़ी गरम प्रदर्शन की शुरुआत की गई थी। उस समय से लेकर आज तक हालात नहीं बदले हैं। रेलकर्मियों का कहना है कि जब बाहर का तापमान 45 से 47 डिग्री होता है, तब लोको केब का तापमान 10 से 12 डिग्री ज्यादा, यानी 55 से 60 डिग्री तक पहुंच जाता है, जिससे काम करना बेहद मुश्किल हो जाता है।एआईएलआरएसए केंद्रीय उपाध्यक्ष कैलाशन ने बताया कि लोको केब की इस हालत पर 17 वर्षों से आंदोलन चल रहा है। अब तक केवल इतना बदला है कि नए लोको इंजनों में AC लगाए जा रहे हैं, लेकिन लगभग 15,000 पुराने लोको अभी भी गर्मी में झुलस रहे हैं। जहां कुछ लोको में AC लगाए गए हैं, वे भी मेंटेनेंस के अभाव में बंद पड़े हैं। संगठन ने आरोप लगाया कि जोनल और डिविजनल रेलवे प्रशासन इस मुद्दे पर उदासीन बना हुआ है, जबकि हाल ही में दिल्ली में हुई CWC बैठक में भी इस विषय पर चर्चा की गई थी।

रेलकर्मियों ने यह भी सवाल उठाया कि जब अधिकारी अपने चैंबर में AC के बिना काम नहीं करते, तो लोको पायलटों को क्यों बिना किसी ठंडी व्यवस्था के काम करना पड़ता है? लोहे के डिब्बे जैसे केब में घंटों बैठकर 55 से 60 डिग्री तापमान में काम करना न केवल शारीरिक थकान लाता है, बल्कि सुरक्षा पर भी असर डालता है। लोको पायलटों का कहना है कि ट्रेनों की रफ्तार और सिग्नलों की संख्या बढ़ने से काम का दबाव और बढ़ा है, मगर सुविधाएं वही पुरानी हैं।आंदोलन कारियों ने कहा कि यदि मांगों पर जल्द निर्णय नहीं लिया गया, तो आंदोलन को और उग्र किया जाएगा।




