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चैत्र नवरात्रि में दुर्गा मंदिरों में विशेष आराधना की जाती है इसी संदर्भ में मां बगदाई का मंदिर विशेष है जहां श्रद्धालु “माता को प्रसाद नहीं बल्कि पत्थर चढ़ाते” हैं।

इन दोनों चैत्र नवरात्रि पर मंदिर- मंदिर में शक्ति की आराधना की जा रही है। अंचल में ऐसे कई शक्ति के मंदिर है जिनकी अपनी ही अनोखी कहानी है। इन्हीं में से एक है बगदाई मंदिर। सरकंडा मुख्य मार्ग से खमतराई जाने वाले रोड पर स्थित इस मंदिर की ख्याति दूर-दूर है तक है। आसपास के श्रद्धालुओं इसे वन देवी के मंदिर के नाम से भी जानते हैं। इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां मनोकामना लेकर पहुंचने वाले भक्त देवी मां को फूल, फल, मिठाइयां अन्य कोई चढ़ावा नहीं बल्कि आसपास के खेत में ही मिलने वाले पांच गोटा पत्थर चढ़ाते हैं, जिसे चंबा पत्थर भी कहा जाता है। यह परंपरा सालों से चली आ रही है। कहते हैं कि यहां पहले जंगल हुआ करता था, जहां से गुजरने वाले लोगों को हिंसक पशुओं का डर था। इसी दौरान एक व्यक्ति को स्वप्न में आकर मां ने यहां उनका मंदिर स्थापित करने का आदेश दिया। साथ ही देवी ने पत्थर चढ़ाने की बात भी कही। उसी भक्त ने देवी की प्रतिमा स्थापित कर आसपास के खेत में मौजूद पांच गोटा पत्थर चढ़ाई। तब से ही माता को प्रसन्न करने के लिए भक्त वन देवी के दरबार में गोटा पत्थर चढ़ाते हैं ।

पुजारी पूरे देश भर में शक्ति स्वरूप मां दुर्गा के अलग-अलग मंदिर है, जहां माँ अलग-अलग नाम से विराजमान है, लेकिन बगदाई मंदिर अपने आप में बिल्कुल विशिष्ट है। यह बात किसी को भी आश्चर्यचकित कर सकती है की देवी को फल फूल प्रसाद की जगह रोज गोटा पत्थर चढ़ा रहे हैं। भक्तों ने अपनी मनोकामना के साथ यहां बड़ी संख्या में पत्थर चढ़ाए हैं। इनके दर्शन करना भी पुण्य कार्य माना जाता है।

करीब 2 एकड़ क्षेत्र में माता का मंदिर स्थापित है। कहते हैं प्राचीन मंदिर का निर्माण स्थानीय जमींदार ने किया था, जहां स्वयंभू माता वन देवी की प्रतिमा सड़क किनारे ही स्थापित कर पूजा की जा रही थी। फिर सपने में आकर माता ने मंदिर स्थापित कर प्रतिमा वहां स्थापित करने का आदेश दिया। इसके बाद वन देवी मंदिर को लोग बगदाई मंदिर के नाम से जानने लगे हैं। साल 2018 में यहां 12 ज्योतिर्लिंग और 2021 में राम जानकी और राधा कृष्ण दरबार का भी निर्माण किया गया।

श्रद्धालु बताते हैं की माता वनदेवी के मंदिर में कोई भी पत्थर, चढ़ावे के रूप में नहीं चढ़ाया जाता बल्कि पास ही खेत में मिलने वाला गोटा यानी कंकड़ पत्थर ही माता को चढ़ाने की परंपरा है। छत्तीसगढ़ में इस पत्थर को चमार गोटा कहा जाता है, जिसे यहां चढ़ावे के रूप में भक्त चढ़ा रहे हैं। यह गोटा पत्थर यहां छोटे से स्टॉल में मिल भी जाता है, स्थानीय लोग गोटा खेतों से ढूंढकर लाते हैं। इस अनोखी परंपरा वाले इस मंदिर में इस नवरात्र पर भी दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन के लिए आ रहे हैं, यहां वन देवी के अलावा मनसा माता, महामाया माता, संतोषी माता, काली माता, भुवनेश्वरी माता, अन्नपूर्णा माता, शीतला माता, दुर्गा माता, शारदा माता, हनुमान, ठाकुर देव, भैरव बाबा, राम जानकी, राधा कृष्ण, शनिदेव आदि की भी मूर्तियां स्थापित है।

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