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बिलासपुर में स्वामी अय्यप्पा की विशेष पूजा, 20 भक्तों ने दीक्षा ग्रहण की

स्वामी अय्यप्पा भगवान शिव और विष्णु के पुत्र माने जाते हैं। मान्यता है कि समुद्र मंथन के दौरान जब भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धर था तब शिव उस पर मोहित हो गए और दोनों के मिलन से ही भगवान अय्यप्पा का जन्म हुआ। भगवान अय्यप्पा को दक्षिण भारत में श्रद्धा भक्ति के साथ पूजा जाता है, खासकर केरल में उनकी विशेष पूजा अर्चना होती है जहां सबरीमाला में उनका विशाल मंदिर स्थित है। हर वर्ष यहां लाखों श्रद्धालु दर्शन और पूजन के लिए पहुंचते हैं। सबरीमाला जाने वाले तीर्थ यात्रियों को 41 दिन का ब्रह्मचर्य का पालन तथा मांस मदिरा से दूर रहना पड़ता है। तीर्थ यात्रियों को नंगे पांव ही पहाड़ की चोटी पर स्थित मंदिर पर चढ़ना होता है ।सबरीमाला की यात्रा से पहले दीक्षा लेने की परंपरा है। शनिवार को बिलासपुर के रेलवे क्षेत्र स्थित कोदंड रामालयम और बालाजी मंदिर में धनुर्मास में होने वाले उत्तर द्वारा विशेष पूजा का आयोजन किया गया। ब्रह्म मुहूर्त में इस आयोजन का आरंभ हुआ। नियम अनुसार यह उत्सव सभी विष्णु मंदिरों में मनाया जाता है। इस अवसर पर स्वामी अय्यप्पा का विशेष अभिषेक और पूजन किया गया। साथ ही अन्न दानम का भी आयोजन हुआ। बिलासपुर में 20 भक्तों ने दीक्षा लेकर माला धारण किया है। जो आगामी दिनों में सबरी माला में भगवान के दर्शन के लिए रवाना होंगे। अखिल भारतीय अय्यप्पा सेवा संगम बिलासपुर के अध्यक्ष आर वी स्वामी ने बताया कि बैकुंठ उत्तर द्वारा विशेष प्रवेश पूजा और गोदा देवी माता की कुमकुम पूजा शनिवार को की गई। स्वामी अय्यप्पा की यह पूजा को वह भक्ति करते हैं जो स्वामी अय्यप्पा माला की दीक्षा लेते हैं । बिलासपुर में 20 भक्तों ने यह दीक्षा ली। इस अवसर पर कई आयोजन हुए, जिनमे भजन कीर्तन , पाड़ी पूजा, महा आरती शामिल रहा। इस अवसर पर यहां अन्न दानम और भंडारा भी किया गया, जिसमें सैकड़ो की संख्या में भक्त शामिल हुए।

सबरीमाला की यात्रा जितनी कठिन है उतना ही इस व्रत को करना भी चुनौतीपूर्ण है। माला धन करने वाले भक्त 41 दिनों तक उपवास रखेंगे। इस दौरान उन्हें काला वस्त्र पहन कर ब्रह्मचारी जीवन यापन करना होगा। 41 दिनों तक बिना चप्पल पहने चटाई पर ही विश्राम करेंगे। इस दौरान वे अपना बाल भी नहीं काटेंगे। सात्विक भोजन करेंगे और नशा से दूर रहेंगे। सबरीमाला जाने से पहले सभी भक्तों को 41 दिनों का यह उपवास रखना होगा। परंपरा अनुसार दक्षिण भारत के सभी विष्णु मंदिरों में भक्तों के प्रवेश से पहले विशेष प्रवेश द्वार होता है जिसे बैकुंठ द्वार कहा जाता है ।मान्यता है कि यह वैकुंठ द्वार एकादशी पर खुलता है । बैकुंठ द्वार पूजन 10 जनवरी को होगा , उससे पहले रेलवे क्षेत्र स्थित बालाजी मंदिर में उत्तर द्वारा की पूजा की गई, जिसमें बड़ी संख्या में स्थानीय श्रद्धालु शामिल हुए।

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