
कोरोना काल में जिन लोगों की जिंदगी सबसे ज्यादा प्रभावित हुई, उनमें रेलवे स्टेशन पर काम करने वाले कुली भी शामिल हैं। बिलासपुर रेलवे स्टेशन में काम कर रहे सैकड़ों कुली आज भी उस दौर की मार झेल रहे हैं। कभी काम मिलता है, कभी नहीं हालात इतने खराब हैं कि दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल हो गया है। स्टेशन में पुरुषों के साथ महिला कुली भी कंधे से कंधा मिलाकर मेहनत कर रही हैं। कई महिलाएं अपने छोटे-छोटे बच्चों को साथ लाकर स्टेशन में काम करती हैं यानी घर और बाहर दोनों जिम्मेदारियां संभाल रही हैं।रेल प्रशासन, छत्तीसगढ़ शासन और जिला प्रशासन ने इन कुलियों को मदद देने का वादा तो किया था, लेकिन ज़मीनी हकीकत अलग है। कोरोना से जैसे-तैसे उबर ही रहे थे कि अब लगातार ट्रेनें रद्द होने और लेटलतीफी ने उनकी रोज़ी-रोटी छीन ली है। स्टेशन पर एक्सेलेरेटर और लिफ्ट जैसी सुविधाओं ने कुलियो की जरूरत को लगभग खत्म कर दिया है।कुलियों का कहना है कि पहले रेलवे हर 15 दिन पर मेहनताना देता था, अब वो भी बंद कर दिया गया है। मेडिकल सुविधा पहले मिलती थी, अब सिर्फ एक रेल पास मिलता है। वर्दी भी समय पर नहीं मिलती। हालात यह हैं कि खुद कमाओ, खुद खाओ नहीं बल्कि कमाई नहीं तो भूखे मरो वाली स्थिति हो गई है। कई कुलियों ने बताया कि वे 12-15 सालों से स्टेशन में काम कर रहे हैं, लेकिन न वेतन है, न नौकरी की सुरक्षा।

रेलवे प्रशासन पहले वरिष्ठता के आधार पर नौकरी देता था, पर अब वह रास्ता भी बंद कर दिया गया है। कोरोना काल के बाद से कामधंधा ठप है और बच्चों की पढ़ाई से लेकर परिवार के पालन-पोषण तक हर मोर्चे पर संकट खड़ा है।महिला कुली भी इन हालातों से जूझ रही हैं। अपने बच्चों को गोद में लेकर, पीठ पर बोझ उठाए ये महिलाएं स्टेशन पर रोज संघर्ष करती हैं। घर का काम, बच्चों की देखभाल और फिर स्टेशन पर कुलीगिरी तीन गुना मेहनत कर रही हैं लेकिन आमदनी आधी भी नहीं है। मई मजदूर दिवस के मौके पर इन कुलियों ने सरकार, रेलवे प्रशासन और राज्य शासन से गुहार लगाई है कि उन्हें सिर्फ वादे नहीं, बल्कि ठोस रोजगार और सम्मानजनक जीवन दिया जाए। वरना स्टेशन की रौनक तो रहेगी लेकिन उनके लिए रोटी की जंग यूं ही जारी रहेगी।




