
बिलासपुर रेलवे ज़ोन में इन दिनों स्वच्छता पखवाड़ा पूरे जोश-खरोश के साथ मनाया जा रहा है। ज़ोनल हेडक्वार्टर से लेकर डिवीज़नल स्तर तक अधिकारी और कर्मचारी इस अभियान में भाग ले रहे हैं। रेलवे प्रशासन बार-बार दावा कर रहा है कि ज़ोन को स्वच्छ और बेहतर बनाने के लिए बड़े स्तर पर प्रयास हो रहे हैं। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या यह सब महज़ कागज़ी खानापूर्ति है? हमारी टीम ने जब बिलासपुर रेलवे स्टेशन की जमीनी हकीकत देखी, तो तस्वीरें बिल्कुल अलग निकलीं और रेलवे के दावे खोखले साबित हुए।

बिलासपुर रेलवे स्टेशन, जिसे एसईसीआर (SECR) ज़ोन का मुख्यालय होने का गौरव प्राप्त है, वहाँ का हाल देखकर कोई भी चौंक सकता है। स्टेशन परिसर में जगह-जगह नाली का गंदा पानी जमा है और ट्रैक किनारे कचरे का ढेर साफ दिखाई देता है। बदबू और गंदगी से यात्री परेशान हैं, लेकिन अधिकारी कागज़ी रिपोर्टों और फोटो सेशन में व्यस्त दिखाई दे रहे हैं। यह दृश्य साफ करता है कि स्वच्छता अभियान की हकीकत, प्रशासन के दावों से कोसों दूर है।स्वच्छता पखवाड़े का मक़सद यात्रियों को साफ-सुथरा और सुरक्षित माहौल देना है।

लेकिन ज़मीनी स्थिति यह है कि पटरियों के आसपास जमा गंदगी बीमारियों को न्योता दे रही है। ट्रैक पर नाली का पानी रुका हुआ है, जो न सिर्फ मच्छरों और संक्रमण का कारण है, बल्कि रेल ट्रैक की मजबूती और सुरक्षा के लिए भी गंभीर खतरा है। सवाल यह है कि जब जीएम और डीआरएम जैसे उच्च अधिकारी खुद निरीक्षण कर रहे हैं, तो उनकी नज़र इन खामियों पर क्यों नहीं पड़ती।यात्री और स्थानीय लोग खुलकर कह रहे हैं कि हर साल ऐसे अभियान होते हैं, लेकिन इनका असर सिर्फ पोस्टर और स्लोगन तक सीमित रहता है। प्लेटफार्म पर दिखावे के लिए सफाई करवा दी जाती है, लेकिन ट्रैक और उसके आसपास की वास्तविक स्थिति जस की तस रहती है।

यानी जहाँ से यात्रियों को गुजरना है, वहाँ सफाई कर कैमरे में कैद कर ली जाती है, लेकिन जहाँ हकीकत छिपाना आसान है, वहाँ गंदगी का अंबार हमेशा की तरह बना रहता है।रेलवे ज़ोन के अधिकारी लगातार सफाई की मॉनिटरिंग का दावा करते हैं। पर हमारी टीम ने जो नज़ारे कैमरे में कैद किए, वे साफ दिखाते हैं कि मॉनिटरिंग केवल कागज़ पर चल रही है। यात्रियों को साफ-सुथरे और सुरक्षित माहौल का भरोसा दिया जा रहा है, लेकिन वास्तविकता में यात्री गंदगी, बदबू और बीमारी के ख़तरों के बीच सफर करने को मजबूर हैं।यह पहली बार नहीं है जब स्वच्छता अभियान के दौरान गंदगी की पोल खुली है। हर बार यही पैटर्न देखने को मिलता है—शुरुआत में दिखावा, बीच में लापरवाही और अंत में कागज़ी रिपोर्ट पूरी। इस बार भी वही हो रहा है। अधिकारियों की मौजूदगी में जहाँ कैमरे लगे हैं, वहाँ सफाई करवाई जा रही है, लेकिन असली गंदगी अब भी रेलवे ट्रैक और नालियों में पसरी हुई है।


