
संधि पूजा एक बहुत ही पवित्र और अहम अनुष्ठान होता है। अष्टमी तिथि की समाप्ति और नवमी तिथि के आरंभ के साथ ही संधि पूजा की शुरुआत होती है। यह संधिकाल बहुत शक्तिशाली और मां की विशेष कृपा-क्षण का समय माना जाता है। शक्ति की साधना नवरात्रि में की जाने वाली दुर्गा पूजा का बहुत ज्यादा महत्व माना गया है. देवी दुर्गा की विशेष पूजा के लिए न सिर्फ पश्चिम बंगाल में बल्कि पूरे देश भर में देवी के कई बड़े पंडाल लगते हैं. जिनमें षष्ठी तिथि से लेकर दशमी के दिन विसर्जन वाले दिन तक विशेष पूजा, अनुष्ठान होते हैं. नवपत्रिका पूजा के बाद दुर्गा पूजा में संधि पूजा का विशेष महत्व माना गया हैहिंदू मान्यता के अनुसार नवरात्रि के पावन अवसर पर देवी दुर्गा की यह विशेष पूजा की जाती है. देवी दुर्गा की यह पूजा अष्टमी और नवमी के संधिकाल में होती है. मान्यता है कि इस पुण्य काल में देवी दुर्गा अपने दिव्य स्वरूप में सभी विघ्न, बाधा, शत्रु और नकारात्मकता को दूर करे साधक को सुख, सौभाग्य और समृद्धि प्रदान करती हैं.

मान्यता है कि इसी पावन संधिकाल में देवी दुर्गा ने चामुंडा का रूप धारण करके चंड और मुंड का वध किया था. इस मौके पर दुर्गा पूजा समिति के सदस्यों ने बताया कि यह पूजा बेहद खास होती है और इसके लिए सभी के इंतजार रहता है । दियो को जहां प्रचलित किया जाता है तो वहीं कद्दू गाना और मिठाई की बलि चढ़ाई जाती है।यह पूजा शुभ मुहूर्त पर ही की जाती है। संधि पूजा एक बहुत ही पवित्र और अहम अनुष्ठान होता है। अष्टमी तिथि की समाप्ति और नवमी तिथि के आरंभ के साथ ही संधि पूजा की शुरुआत होती है। यह संधिकाल बहुत शक्तिशाली और मां की विशेष कृपा-क्षण का समय माना जाता है। हिंदू शास्त्रों और पुराणों में कहा गया है कि संधि काल में की गई पूजा, जप और मां की आराधना शीघ्र ही फल देने वाली होती है।अनेकानेक दीपकों की रोशनी से जगमगाती और कमल के फूलों की सुगंध से सुवासित होती संधि पूजा, जगत जननी मां जगदंबा की उपासना का दिव्य रूप मानी जाती है। धर्म की रक्षा के लिए मां के दिव्य रूप की आराधना माता के भक्तों को यह विश्वास दिलाती है कि अधर्म पर हमेशा धर्म की ही जीत होती है।


