
गोवर्धन पूजा पर्व को लेकर ग्वाल समाज मे विशेष उत्साह दिखाई दिया। देर शाम वे परिवार के साथ अपने सजे धजे गौ वंश को लेकर घरों से निकले। बैंड बाजे की धुन पर शोभायात्रा मे चलते पशुओं का श्रृंगार देख लोग उन्हें निहार रहे थे। पैरों से लेकर सिंग तक सजाया था। भारतीय परम्परा और उत्सव में प्रकृति के प्रति आदर और समाज के प्रति उत्तदायित्व समाहित है। गोवर्धन पूजा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। शनिचरी और चांटीडीह मे रहने वाला ग्वाला समाज हर बरस दीपावली के बाद गोवर्धन पूजा पर पारंपरिक शोभायात्रा निकालता जिसमें गौ वंश के साथ युवाओं का शौर्य प्रदर्शन मुख्य आकर्षण होता है।

यह दिन पशुओं के प्रति कृतज्ञता का भाव प्रकट करने का अवसर होता।हमारी संस्कृति ने हमें छोटी से छोटी चीज प्रदान करने वालों के प्रति भी आभार करना सिखाया है। गोवर्धन पूजा पर्व प्रकृति के उसी दाता स्वरूप को साकार रूप मे देखा जाता है। लाल हरे और पीले वस्त्रों मे सजी महिलाओ ने वाल्मीकि चौक पहुंचकर गोवर्धन और गौवंश की पूजा कर उनकी आरती की। उन्हें मिष्ठान खिलाकर प्रणाम किया।प्रकृति, पर्यावरण और पशुधन संवर्धन का यह पर्व उत्सव के रूप मे मनाया।


