अचानकमार टाइगर रिज़र्व में खुली लापरवाही!वन विभाग की नींद में जंगली सुरक्षा दफन, टाइगर रिज़र्व बना पिकनिक स्पॉट!

अचानकमार टाइगर रिज़र्व एक नवंबर से आम पर्यटकों के लिए खुलने जा रहा है, लेकिन उससे पहले ही जंगल के दरवाजे हर किसी के लिए खुले पड़े हैं। नियम, कानून और सुरक्षा व्यवस्था सब हवा में उड़ गई है। जो रिज़र्व बाघों और दुर्लभ वन्यजीवों की शरणस्थली कहलाता है, वह अब शराबियों और मनचलों की ऐशगाह बन चुका है, और वन विभाग के अधिकारी मूकदर्शक बने तमाशा देख रहे हैं। बिलासपुर और मुंगेली जिले की शान माने जाने वाला अचानकमार टाइगर रिज़र्व इन दिनों अपनी पहचान खोता नज़र आ रहा है। यहां जंगलों की सुरक्षा के लिए कड़े नियम बनाए गए हैं, मगर हकीकत में उनका कोई पालन नहीं हो रहा। रिज़र्व के गेट लगे जरूर हैं, लेकिन अब उनका कोई अर्थ नहीं रह गया। जंगली रास्तों से दोपहिया और चारपहिया वाहन बिना रोकटोक अंदर घुस रहे हैं जैसे ये कोई सरकारी रिज़र्व नहीं, बल्कि निजी मैदान हो।हमारी टीम ने जब मौके पर जाकर नज़ारा देखा तो नतीजे चौंकाने वाले थे। जंगल के बीच शराब पार्टी चल रही थी, कहीं कैम्प फायर, तो कहीं पिकनिक का मज़ा। नशे में धुत युवक खुलेआम फर्राटे से गाड़ियां दौड़ा रहे थे। जो इलाका आम पर्यटकों के लिए बंद है, वहां स्थानीय लोग ऐसे घूम रहे हैं जैसे यह उनका निजी फार्महाउस हो। ये सब कुछ टाइगर रिज़र्व के भीतर हो रहा है और वन विभाग आंख मूंदे बैठा है।वन विभाग के अधिकारी हर साल कड़ी निगरानी और सख्त कार्रवाई के दावे करते हैं, लेकिन जमीन पर हालात इन दावों का मजाक बना रहे हैं। जब आम पर्यटकों को प्रवेश की अनुमति तक नहीं दी गई, तब भी जंगल में बेतहाशा आवागमन जारी है।

सवाल उठता है अगर आम लोगों की पहुंच इतनी आसान है, तो शिकारी और तस्कर यहां क्या नहीं कर रहे होंगे।इस खुली लापरवाही ने अचानकमार के पूरे ईको सिस्टम को खतरे में डाल दिया है। बाघ, भालू, तेंदुआ जैसे वन्यजीव लगातार इंसानी दखल से भयभीत हैं। कैमरा ट्रैप की निगरानी ठप है, सुरक्षा गश्त केवल कागज़ों पर चल रही है और गार्डों की तैनाती दिखावे से ज़्यादा कुछ नहीं लगती। सवाल ये है कि आखिर वन विभाग किसकी सुरक्षा कर रहा है जंगल की या जंगल के बहाने चल रहे धंधे की।वन विभाग के जिम्मेदार अधिकारी इस पूरे मामले पर चुप्पी साधे हुए हैं। कोई जांच नहीं, कोई रोक नहीं। लगता है जैसे ये रिज़र्व वन्यजीवों से ज़्यादा प्रभावशाली लोगों के लिए सुरक्षित है।सवाल अब सिर्फ प्रशासनिक नहीं, नैतिक भी है जब जंगलों के रखवाले ही लापरवाह बन जाएं तो बाघों के भविष्य का क्या होगा।अचानकमार की ये तस्वीरें वन विभाग की नाकामी की खुली किताब हैं। गेट हैं, पर नियंत्रण नहीं… नियम हैं, पर पालन नहीं… सवाल हैं, पर जवाब कोई नहीं। अब देखना ये है कि वन विभाग इस जंगल की आवाज़ सुनेगा या फिर अपनी कुर्सियों की सुरक्षा में ही खोया रहेगा।

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