
अज्ञात शव की पहचान और मेडिकल जांच में जहाँ सामान्यतः 72 घंटे का नियम माना जाता है, वहीं इस मामले में पोस्टमार्टम पूरे आठ दिन बाद किया गया। देर होने से जांच टीम को शव की स्थिति के आधार पर स्पष्ट निष्कर्ष निकालने में कठिनाई आई।विशेषज्ञों के अनुसार इतने लंबे अंतराल में डिकंपोज़िशन काफी बढ़ जाता है, जिससे चोटों, बाहरी निशानों और मौत के सही समय का अनुमान प्रभावी ढंग से नहीं हो पाता। यही वजह है कि ऐसी देरी जांच को प्रभावित कर देती है।फोरेंसिक टीम ने उपलब्ध परिस्थितियों और संरक्षित साक्ष्यों के आधार पर रिपोर्ट तैयार की, लेकिन शव की स्थिति ने विश्लेषण की सटीकता पर असर डाला। मौसम और समय दोनों ने शरीर के प्राकृतिक परिवर्तनों को तेज कर दिया था।आखिरकार पोस्टमार्टम के बाद परिजनों को शव सौंपा गया और आठ दिन बाद क्रियाकर्म सम्पन्न किया गया। परिजन अब जांच में देरी के कारणों और जिम्मेदारी तय करने की मांग कर रहे हैं।


