ज़ोनल मुख्यालय में सुरक्षा बेपटरी, यात्रियों की हिफ़ाज़त पर सवाल आरपीएफ जवान बंगलों में तैनात, स्टेशन-ट्रेनें भगवान भरोसे

दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे का ज़ोनल मुख्यालय, जहां से पूरे रेल ज़ोन की सुरक्षा और संचालन की कमान संभाली जाती है, आज खुद सुरक्षा के सवालों से घिरा है। महानिरीक्षक सह प्रधान मुख्य सुरक्षा आयुक्त से लेकर सहायक मुख्य सुरक्षा आयुक्त तक, आरपीएफ के तमाम वरिष्ठ अधिकारी इसी शहर में पदस्थ हैं। बावजूद इसके, स्टेशन और ट्रेनों में यात्रियों की सुरक्षा लगातार कमजोर पड़ती जा रही है। बिलासपुर समेत कई स्टेशनों पर चोरी, छेड़छाड़ और अव्यवस्था की घटनाएं बढ़ रही हैं, लेकिन आरपीएफ जवान प्लेटफॉर्म और ट्रेनों में गश्त करते नहीं दिखते।

अगर कहीं जवान नजर आते हैं, तो वे स्टेशन की बजाय अधिकारियों के बंगलों की चारदीवारी के भीतर तैनात मिलते हैं। यही नहीं, कई-कई शिफ्टों में एक अधिकारी के पास 4 से 6 जवान ड्यूटी में लगाए जाने की बात सामने आ रही है।चौंकाने वाली बात यह है कि जिन बंगलों में जवान तैनात हैं, वे न तो संवेदनशील श्रेणी में आते हैं और न ही किसी विशेष सुरक्षा मानक के अंतर्गत। इसके बावजूद रेलवे सुरक्षा बल का बड़ा हिस्सा निजी सुरक्षा में झोंक दिया गया है।

इससे स्टेशन की गश्त कम हो गई है और कई प्लेटफॉर्म पर घंटों तक एक भी आरपीएफ जवान मौजूद नहीं रहता।सूत्र यह भी बताते हैं कि बंगलों में तैनात जवानों से ड्यूटी के नाम पर निजी और गैर-सरकारी काम भी कराए जा रहे हैं। जवानों के भीतर भारी असंतोष है, लेकिन बोलने की हिम्मत कोई नहीं करता। वरिष्ठ अधिकारियों के साथ रहकर काम करना उनकी मजबूरी बन चुका है और इसी मजबूरी में उनकी मूल जिम्मेदारी पीछे छूटती जा रही है।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि आरपीएफ जवानों की प्राथमिक जिम्मेदारी क्या है अधिकारियों के निजी आवासों की सुरक्षा या फिर रेलवे यात्रियों, ट्रेनों और रेलवे संपत्ति की रक्षा? क्या स्टाफ की कमी का हवाला देकर ज़ोनल मुख्यालय में बैठे अधिकारी निजी सुरक्षा को प्राथमिकता देते रहेंगे और सार्वजनिक सुरक्षा को नजरअंदाज करते रहेंगे।यात्रियों का कहना है कि स्टेशन पर आरपीएफ की मौजूदगी बेहद कम नजर आती है, जिससे आंतरिक और बाहरी सुरक्षा दोनों प्रभावित हो रही हैं।

फिलहाल अब देखना यह होगा कि इस संवेदनशील मुद्दे के सामने आने के बाद क्या रेलवे प्रशासन कोई ठोस कदम उठाता है, क्या जवानों को बंगलों की ड्यूटी से राहत मिलती है और क्या स्टेशन व ट्रेनों की सुरक्षा वाकई दोबारा पटरी पर लौट पाती है या फिर सवाल यूं ही अनसुने रह जाएंगे।

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