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अखंड सौभाग्य और पति के दीर्घायु होने की कामना के साथ सुहागिन महिलाओं ने गुरुवार को वट सावित्री का व्रत रखा।

अखंड सौभाग्य और पति के दीर्घायु होने की कामना के साथ सुहागिन महिलाओं ने गुरुवार को वट सावित्री का व्रत रखा। महिलाएं समूह में थाल सजाकर वट वृक्ष के नीचे पहुंची और विधिवत्त पूजा अर्चना की। भारतीय संस्कृति की कई विशेषताओं में से एक है संबंधों के प्रति समर्पण और प्रकृति का संरक्षण। इन्हीं दोनों भावनाओं का समावेश वट सावित्री पर्व पर देखा जा सकता है। वट वृक्ष की अपनी ही महिमा है। विशालकाय वट वृक्ष के ऊपर जहां तरह-तरह के पक्षियों और जीव जंतुओं को बसेरा मिलता है तो वही यह वृक्ष फल और छाया देने के साथ मिट्टी एवं जल संरक्षण और ऑक्सीजन भी भारी मात्रा में देता है। इसी वृक्ष की महिमा दर्शाने के लिए संभवत हमारे पूर्वजों ने वट सावित्री पर्व मनाना आरंभ किया। मान्यता है कि वट वृक्ष की जड़ों में ब्रह्मा, तने में भगवान विष्णु और डालियों एवं पत्तियों में भगवान शिव का निवास होता है। इस वृक्ष की लटकती हुई शिराओं में देवी सावित्री का निवास माना जाता है।

पौराणिक कथा अनुसार अल्पायु सत्यवान के प्राण हरने के बाद देवी सावित्री ने यम का पीछा किया और प्रकृति के चक्र को पलटते हुए अपने पति सत्यवान को पुनर्जीवन दिया। वटवृक्ष के नीचे ही यमराज ने सत्यवान के प्राण हरे थे और यही वे पुनर्जीवित हुए। इसी स्मृति में हर वर्ष ज्येष्ठ मास की अमावस्या को वट सावित्री का पर्व मनाया जाता है। इस गुरुवार को भी वट सावित्री व्रत पर सुहागिन महिलाएं व्रत रखकर, स्नान आदि के पश्चात पारंपरिक वस्त्रों में सोलह श्रृंगार कर अपने-अपने क्षेत्र के वट वृक्षों के नीचे पहुंची, जहां अखंड सौभाग्य का वरदान मांगते हुए पूजा अर्चना की गई। वट वृक्ष के तने में जल अर्पित करते हुए देसी घी का दीपक जलाया गया। हल्दी, कुमकुम, फुल, चंदन, अक्षत, फल, प्रसाद आदि पूजन सामग्री अर्पित की गई। वट वृक्ष के चारों ओर सात बार परिक्रमा करते हुए सफेद कच्चा सूत बांधा गया। तत्पश्चात सभी ने वट सावित्री कथा का पाठ और श्रवण किया। अंत में आरती के साथ पूजा का समापन हुआ। सुहागिन महिलाओं ने माता सावित्री का आशीर्वाद लेते हुए पति के दीर्घायु और अखंड सौभाग्य का वरदान मांगा।

संसार में किसी और संस्कृति में संबंधों को समर्पित ऐसे व्रत शायद ही होते होंगे। संभवत भारत ही एकमात्र ऐसा देश है, जहां महिलाएं कभी अपनी संतान, तो कभी पति, तो कभी भाई की मंगल कामना के साथ व्रत रखती है। यह व्रत प्रकृति संरक्षण का भी संदेश देता है। जाहिर है जिस वक्त की पूजा की जाती है उसका संरक्षण भी किया जाएगा, जिससे पूरे जीव जगत का कल्याण संभव है। सनातन धर्म के अधिकांश व्रत और त्योहारो में इसी तरह प्रकृति और जीव जंतु को सम्मान देने का भाव निहित होता है। वट सावित्री व्रत भी इससे पृथक नहीं है। इसी संदेश के साथ बिलासपुर में भी जगह-जगह महिलाओं ने व्रत रखकर वट सावित्री पूजा अर्चना की और घर मे सात्विक भोजन ग्रहण किया गया।

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