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खेल सिर्फ जीत-हार नहीं, जज़्बे और पहचान का प्रतीक है ,बिलासपुर स्नूकर टूर्नामेंट ने दी नई उड़ान विजेता आज़ातशत्रु सिंह, उपविजेता अंकुर कश्यप

खेल सिर्फ जीत-हार का नाम नहीं है, खेल समाज में ऊर्जा, अनुशासन और पहचान का प्रतीक है। बिलासपुर में हुए स्नूकर टूर्नामेंट ने यह साबित कर दिया कि अगर जज़्बा सच्चा हो तो हर खेल को नई पहचान दी जा सकती है। सितंबर से शुरू हुए स्नूकर टूर्नामेंट में कुल 64 खिलाड़ियों ने भाग लिया। रोमांचक मुकाबलों की लंबी श्रृंखला के बाद एडवोकेट अंकुर कश्यप और आज़ातशत्रु सिंह ने शानदार प्रदर्शन करते हुए फाइनल में जगह बनाई।वहीं फाइनल में आजात शत्रु विजेता रहे जबकि उपविजेता अंकुर कश्यप रहे।वहीं आरिफ मोहम्मद और शहज़ाद हुसैन सेमि फाइनल तक ही टिक सके।बता दें 14 सितंबर रविवार को खेले गए इस फाइनल मुकाबले को बिलियर्ड्स एवं स्नूकर फेडरेशन ऑफ इंडिया के नियमों के तहत कराया गया, ताकि खिलाड़ियों को राष्ट्रीय स्तर जैसा अनुभव मिले।स्नूकर को अक्सर टाइमपास का खेल समझा जाता है, लेकिन आयोजकों ने इस धारणा को तोड़ते हुए इसे जेंटलमैन गेम की तरह प्रस्तुत किया। उनका उद्देश्य था कि शहर के युवा इस खेल को गंभीरता से अपनाएं और आने वाले दिनों में नेशनल और इंटरनेशनल लेवल पर चमक बिखेरें।

विजेता आज़ातशत्रु सिंह ने आयोजन को सफल बताते हुए कहा कि स्नूकर को भारत में अभी तक उतनी पहचान नहीं मिली है, लेकिन बिलासपुर जैसे शहरों से उठी ऐसी पहल युवा खिलाड़ियों को बड़ा मंच दिला सकती है। उन्होंने विश्वास जताया कि आने वाले समय में यहां से और भी खिलाड़ी राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचेंगे।वहीं उपविजेता अंकुर कश्यप ने कहा कि टूर्नामेंट का असली मकसद यही है कि लोग स्नूकर को केवल टाइमपास नहीं, बल्कि करियर और सम्मानजनक खेल के रूप में देखें। उन्होंने उम्मीद जताई कि जिस तरह रायपुर और अन्य शहरों में यह खेल लोकप्रिय है, उसी तरह बिलासपुर से भी बड़ी संख्या में खिलाड़ी निकलेंगे। सचमुच यह आयोजन सिर्फ एक टूर्नामेंट नहीं था, बल्कि खेल भावना को जीवित रखने का एक प्रयास था। बिलासपुर ने यह संदेश दिया है कि चाहे मैदान का खेल हो या टेबल पर खेला जाने वाला स्नूकर, प्रतिभा को बस मौके की जरूरत होती है। और यही मौका अब शहर के युवाओं को नया आसमान देने वाला है।स्नूकर की बात करें तो इसकी शुरुआत वर्ष 1875 में भारत के जबलपुर से हुई थी। भारत ने ही इस खेल को जन्म दिया, लेकिन विडंबना यह है कि आज भी देश में स्नूकर को वह महत्व नहीं मिल पाया जिसकी यह हकदार है। यही कारण है कि इस टूर्नामेंट का उद्देश्य युवाओं को जागरूक करना और खेल को गंभीरता से अपनाने के लिए प्रेरित करना रहा।

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