
धर्म ग्रंथों के अनुसार शारदीय नवरात्रि के पहले दिन जब दुर्गा माता की प्रतिमा स्थापित की जाती है तो साथ में एक मिट्टी के बर्तन में जवारे भी बोए जाते हैं। 9 दिन में ये जवारे बड़े हो जाते हैं। दसवें दिन दुर्गा प्रतिमा का विसर्जन करते समय इन जवारों को भी नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है।शारदीय नवरात्रि समाप्त होने के अगले दिन यानी दशमी तिथि पर दुर्गा प्रतिमा व जवारों का विसर्जन किया जाता है। इस बार नवरात्रि का अंतिम दिन 1 अक्टूबर, बुधवार को है। इसके अगले दिन यानी 2 अक्टूबर को दशहरे पर दुर्गा प्रतिमा व जवारों का विसर्जन करना शास्त्र सम्मत है। इसी कड़ी में विजयदशमी के बाद शुक्रवार को देवी प्रतिमाओं का विसर्जन के साथ जवारे का भी विसर्जन करता और शुरू हो गया सुबह से ही शहर के विसर्जन स्थल पर लोग जवारे को विसर्जित करने नदी के तट पर पहुंचते रहे और विधि विधान के साथ जवारे का विसर्जन किया गया इस दौरान महिलाओं के द्वारा जवारे को सिर में लगकर विसर्जन स्थल पर पहुंच गया। लेकिन पूरे रास्ते भर माता का आशीर्वाद प्राप्त करने लोग दंडवत होते रहे इस दौरान पुजारी ने बताया कि पिछले कई वर्षों से वह लगातार इसी तरह से नवरात्र के दिनों में जवारे को स्थापित करने से लेकर विसर्जन करने तक विधि विधान का पूरा ख्याल रखते आ रहे हैं और अंतिम दिन विसर्जन करने के साथ माता अपने घर विदा होती है।


