
बिलासपुर रेल हादसे को बीते कई दिन हो गए हैं, लेकिन पीड़ित परिवारों के ज़ख्म अभी भी भरे नहीं हैं। मुआवज़े और नौकरी की मांग को लेकर अब राजनीति भी चरम पर है। जिला कांग्रेस कमेटी ने धरना दिया, लेकिन रेलवे का कहना है कि उनके नियम इतनी मांगों की अनुमति नहीं देते। हादसे की वजहों और राजनीति के बीच असल सवाल यह है कि क्या पीड़ित परिवारों को उनका हक़ मिल पाएगा। 4 नवंबर को बिलासपुर में हुए बड़े रेल हादसे का दर्द अभी भी लोगों के ज़ेहन में ताज़ा है। हादसे में मृतकों और घायलों को रेलवे की ओर से मेडिकल सुविधा और मुआवज़ा राशि दी जा चुकी है, लेकिन अब इसी को लेकर विवाद और राजनीति तेज़ हो गई है।

मृतकों के परिजनों को और अधिक मुआवज़ा देने तथा रेलवे में नौकरी प्रदान करने की मांग तेज़ हो रही है।जिला कांग्रेस कमेटी ने शुक्रवार को इस मुद्दे पर धरना और प्रदर्शन किया, लेकिन विशेषज्ञों और रेलवे सूत्रों का कहना है कि रेलवे के नियमों में ऐसी कोई व्यवस्था ही नहीं है जिसमें सभी मामलों में नौकरी या अतिरिक्त मुआवज़ा अनिवार्य हो। यही कारण है कि उनकी मांगें व्यावहारिकता से दूर मानी जा रही हैं और इसे राजनीतिक लाभ के लिए उठाया गया मुद्दा बताया जा रहा है।हालांकि, मस्तूरी विधायक दिलीप लहरिया ने हादसे के तुरंत बाद मुख्यमंत्री और रेल मंत्री को पत्र लिखकर मृतकों के परिवारों को आर्थिक सहायता और नौकरी देने की मांग की थी, लेकिन उच्च स्तर पर इन मांगों पर खास गौर नहीं किया गया।

उधर, इस पूरे मामले में रेलवे की कार्यप्रणाली भी सवालों के घेरे में है। बताया जा रहा है कि दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे में ‘कवच’ तकनीक अब तक लागू नहीं की गई है, जबकि रेलवे इसे सुरक्षा के बड़े दावे के रूप में पेश करता रहा है। इसके अलावा, जिस ऑटो सिग्नलिंग सिस्टम को आधुनिक तकनीक बताकर प्रचारित किया जा रहा था, वही इस हादसे के लिए जिम्मेदार माना जा रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि किसी आंदोलन से मृतकों के परिवारों को वास्तविक लाभ मिलता है तो ऐसे प्रयासों का स्वागत होना चाहिए, लेकिन यदि आंदोलन केवल राजनीतिक चमकाने के लिए किए जाएं तो इसका नुकसान सिर्फ पीड़ित परिवारों को ही झेलना पड़ता है।


