छत्तीसगढ़ का लोक पर्व भोजली इस वर्ष बिलासपुर में शाम को हुई तेज बारिश के बीच मनाया गया। बिलासपुर के कुछ प्रमुख घाट है जहां भोजली का विसर्जन किया जाता है, जिसमें सबसे प्रमुख है पचरी घाट इस वर्ष भी यहां बारिश की परवाह न करते हुए बड़ी संख्या में भोजली लेकर महिलाएं पहुंची और उसका पारंपरिक रूप से विसर्जन किया।

भोजली का महत्व कृषि पर्यावरण संरक्षण से लेकर सामाजिक सौहार्द तक फैला हुआ है। ग्रामीण समाज में फसल की समृद्धि और परिवार की खुशाली की कामना के साथ इसे मनाया गया। इस मौके पर शनिचरी बाजार के हैप्पी स्ट्रीट के पास भोजली महोत्सव का भी आयोजन किया गया, छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति एवं कला मंच द्वारा भोजली समितियां को पुरस्कार का वितरण किया गया। महिलाएं और बच्चे मिट्टी के बर्तनों में बीज बोकर, पूरे श्रावण मास में इसकी देखभाल करते हैं। भोजली विसर्जन के लिए महिलाएं भोजली के गीत गाते हुए, इसे सिर पर धारण कर शोभायात्रा निकली।

भोजली छत्तीसगढ़ का महत्वपूर्ण त्योहार है। नई फसल की कामना के लिए गांवों में यह त्यौहार प्रमुख रूप से मनाया जाता है। ग्रामीण इलाकों में महिलाएं, लड़कियां, पुरुष, युवा एक दूसरे को निभाने का संकल्प लेते हैं। भोजली त्योहार के मौके पर महिलाएं और युवतियों ने भोजली की टोकरियां सिर पर रखकर तालाब किनारे पहुंचकर इस भरोसे और उम्मीद के साथ विसर्जन करती हैं कि इस वर्ष फसल अच्छी होगी। उनकी मित्रता चिर स्थायी रहेगी और अगले वर्ष फिर हंसी खुशी सब मिलकर यह त्योहार मनाएंगी।

छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक वैभव के प्रतीक भोजली पर्व का अपना आग महत्व है। छत्तीसगढ़ का लोक पर्व भोजली मनाने के लिए बिलासपुर में एक स्थाई भोजली घाट की मांग लंबे समय से की जा रही है। इसके लिए पचरी घाट, तोरवा पटेल मोहल्ला या फिर स्मृति वन का अरपा तट उपयुक्त होगा। इसे लेकर लंबे समय से स्थानीय लोग अपनी मांग दोहरा रहे हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि जल्द ही बिलासपुर में स्थाई छठ घाट की तरह एक भोजली घाट भी होगा।


