मां महामाया की हर बात निराली है। दुनिया की सबसे प्राचीन और लंबे समय तक राजधानी का गौरव हासिल रतनपुर की पहचान भी मां महामाया से ही है। मां महामाया का मंदिर सिद्ध शक्तिपीठ है, जहां चार नवरात्र श्रद्धापूर्वक मनाये जाते हैं, इनमें से शारदीय और चैत्र नवरात्रि की तो बात ही निराली है, जब दर्शन करने लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं, तो वही हजारों हजार मनोकामना ज्योति कलश प्रज्जवलित किए जाते हैं। इस वर्ष भी चैत्र नवरात्र का पर्व धूमधाम से मनाया गया। नवमी तिथि पर सुबह 6:00 बजे मां महामाया का राजश्री श्रृंगार किया गया। देवी प्रतिमा पे सोने के हार, कुंडल, नथनी मुकुट, छत्र आदि चढ़ाए गए तो वही सुबह 10:00 बजे देवी को 56 प्रकार का नैवेद्ध भोग लगाया गया। महानवमी पर यहां कन्या पूजन और प्रसाद वितरण के बाद जावरा का विसर्जन किया गया। मां के राजसी श्रृंगार स्वरूप के दर्शन के लिए बुधवार को भी महामाया मंदिर में श्रद्धालु उमड़ पड़े।


रतनपुर में स्थापित प्राचीन महामाया मंदिर को देश की 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। हर शक्तिपीठ की भांति यहां भी नवरात्र पर विशेष अनुष्ठान होते हैं लेकिन संभवतः यह एक मात्र शक्तिपीठ है जहां देवी का राजश्री श्रृंगार किया जाता है, यह अलौकिक है । देवी का 5 किलो सोने के आभूषण से श्रृंगार किया गया। सुरक्षा की दृष्टि से ही यह आभूषण वर्ष के अन्य दिनों में बैंक में रहते हैं, जिन्हें लॉकर से लाकर देवी का श्रृंगार कराया जाता है । इस अवसर पर मंदिर में सुरक्षा के लिए हथियारबन्द जवान भी तैनात होते हैं। यहां देवी को हर दिन अलग-अलग वस्त्र पहनाने की परंपरा है लेकिन नवरात्र पर पहले दिन देवी को जो वस्त्र पहनाया जाता है वह आठवें दिन तक नहीं बदलता। नवमी पर वस्त्र बदलने के साथ आभूषण के साथ उनका अद्भुत श्रृंगार किया जाता है। अंतिम दिवस उन्हें विविध व्यंजनों का छप्पन भोग लगाया गया।




रतनपुर मां महामाया का वर्ष में तीन बार राजश्री श्रृंगार किया जाता है। शारदीय और चैत्र नवरात्र के अलावा दिवाली पर यह श्रृंगार होता है। पिछले वर्ष जब महामहिम राष्ट्रपति देवी के दर्शन के लिए पहुंची थी तब भी मां महामाया का राजषी श्रृंगार किया गया था। विगत वर्षों की भांति इस वर्ष भी महानवमी पर कन्या पूजन और भंडारे का आयोजन किया गया। तेज गर्मी के बावजूद अंतिम दिन भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन-पूजन के लिए रतनपुर पहुंचे।





