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सरकण्डा शिव वरदानी भवन के प्रागंण में हो रहे छठवें दिवस के श्रीमद् भगवत गीता सार खुश हाल जीवन का आधार का शुभारम्भ दीप प्रज्जवलित कर किया गया ।

कथावाचक ब्र.कु. भारती दीदी ने आज श्रीमद् भगवत गीता ज्ञान का प्रवचन देते हुए कहा कि महाभारत के रचयिता महर्षि वेदव्यास और रामायण के रचयिता महार्षि बल्मिकी त्रिकालदर्शी ऋषि थे। इनको भूत ,भविष्य ,वर्तमान का ज्ञान था । इसी संदर्भ में भारत के उत्थान और पतन के चौरासी जन्मों की कहानी पर प्रकाश डाला गया। यह संसार निरन्तर चलने वाला मुसाफिर खाना है जिसमें आत्मायें ब्रह्मलोक से इस साकार मनुष्य लोक में आकर यह पाँच तत्व का चोला धारण कर कर्म करती है। एक शरीर छोड़ दूसरा शरीर धारण करती है इस प्रकार चौरासी चोला धारण करती है। इसे ही जन्म – मृत्यु का चक्र कहते हैं।। कभी आत्मा बालक का तन लेती है तो कभी वही आत्मा पुनर्जन्म में बालिका का तन । शरीर विनाशी और परिवर्तन शील है लेकिन आत्मा अजर, अमर , अविनाशी है।

आम के बीज से आम का पेड़ , केले से केले के पौधे निकलते हैं ठीक वैसे मनुष्य की आत्मा देह त्याग पश्चात् मनुष्य तन में ही पुनर्जन्म लेकर कर्म करती है । चार युग सतयुग , त्रेता , द्वापर , कलियुग होते हैं। सतयुग में श्री लक्ष्मी श्रीनारायण सर्वगुण सम्पन्न , सोलह कला सम्पूर्ण , सम्पूर्ण निर्विकारी , सम्पूर्ण अहिंसक होते हैं। इनके एकछत्र राज्य में एक मत , एक धर्म , एक भाषा , एक कुल होता है धार्मिक और राजनीतिक सत्ता भी एक के हाथ पर होता है । ऐसे स्वर्णिम संसार वाले भारत को सोने की चिड़िया कहते थे ।इसके लिए ही गायन है नर ऐसी करनी करें कि श्रीनारायण और नारी ऐसी करनी करें कि श्रीलक्ष्मी बन जाये । ऐसे कर्म कराने वाले परमपिता शिव परमात्मा है। त्रेतायुग में श्री सीता श्री राम का राज्य । श्रीराम के हर चरित्र का अनुशरण करके आदर्श व्यक्तित्व का निर्माण कर सकते हैं। नियम और मर्यादा की रेखा के अन्दर किया हुआ कर्म सदा सुखदायी होता है।

द्वापर युग से पूजा – पाठ , भक्ति – भाव की शुरुआत होती है। सर्वप्रथम शिवजी के मंदिर बनते हैं तत्पश्चात् अनेक देवी देवताओं की पूजा होती है। कलियुग में कलाहीन हो जाते हैं काम , क्रोध , लोभ , मोह , अहंकार की चरम स्थिति तथा धर्म ग्लानि का समय होता है । कलियुग और सतयुग के बीच का महत्वपूर्ण पुरुषोत्तम संगमयुग पर परमपिता शिव परमात्मा श्रीमद् भगवत गीता में किये वायदे के अनुसार भारत भूमि पर दिव्य अवतरण लेकर कलियुग को सतयुग, नरक को स्वर्ग और मनुष्य मात्र को देवी देवता बनने की ईश्वरीय ज्ञानयोग की शिक्षा देते हैं। जिससे भारत पुनः ईश्वरीय विधान के अनुसार सतयुग बनेगा

। शास्त्रों में वर्णित श्री विष्णु के नाभि कमल से ब्रह्मा जी की उत्पत्ति का रहस्य भी यही है कि श्री नारायण के अंतिम चौरासवें जन्म प्रजापिता ब्रह्मा जी के ललाट पर शिव जी का अवतरण होता है । ब्रह्माजी के मुख कमल से परमात्मा शिव द्वारा उच्चारें गये महावाक्य को धारण करने वाले ब्रह्माकुमार और ब्रह्माकुमारियों की आत्मा पावन बनकर सतयुगी दैवी पावन सृष्टि पर देवी देवता का देवपद को प्राप्त करेंगे। संध्या आरती में जिला महिला प्रभारी पतंजली की श्रीमती रश्मि श्रीवास्तव, अनेक सामाजिक संगठनो से जुड़ी सामाजिक कार्यकर्ता श्रीमति शशि आहूजा, तथा रेणुका बहन एवं क्षेत्रीय ब्रह्माकुमारी संस्था तालापारा की संचालिका बी . के . रमा दीदी एंव सैकड़ो भक्तगण शामिल हये।

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