
सनातन धर्म में महा सप्तमी तिथि का खास महत्व है। महा सप्तमी की रात में निशा पूजा होती है। वहीं अष्टमी को संधि पूजा की जाती है। देवी मां काली की पूजा करने से साधक के सुख और सौभाग्य में वृद्धि होती है। नवरात्र के दौरान करने से अक्षय फल मिलता है। वही सोमवार को सुबह बंगाली पूजा पंडालों में महासप्तमी पूजा संपन्न कराई गई। जहां बंगाली रीति रिवाज और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पूजा अर्चना हुई सनातन परंपरा में नवरात्रि के 09 दिन देवी पूजा के लिए समर्पित हैं. इसी नवरात्रि के पावन पर्व में बंगाल, ओडिशा समेत देश के अन्य भागों में दुर्गा पूजा का उत्सव बहुत धूमधाम से मनाया जाता है. दुर्गा पूजा के लिए पांच दिन बेहद खास माने गये हैं. इसमें पंचमी तिथि को कलश स्थापना होती है तो वहीं षष्ठी तिथि को कल्पारंभ होता है जो कि नवपत्रिका के ठीक एक दिन पहले होता है. नवरात्रि की महासप्तमी का दिन नवपत्रिका पूजा के लिए जाना जाता है.

इसे दुर्गा पूजा के अनुष्ठान का शुभारंभ माना जाता है.लिहाजा सोमवार को महासप्तमी के अवसर पर सभी दुर्गा पूजा पंडालों में मां की विधि विधान से पूजा अर्चना की गई। वही बंगाली दुर्गा पूजा पंडालों में सुबह से ही बंगाली समाज के सदस्य धपली के थाप के बीच महासप्तमी के रीति रिवाज और विधि विधान से पूजा संपन्न कराने पहुंचे जहां नदी में विधिवत पूजा अर्चना के बाद पूजा पंडाल में माता की पूजा अर्चना की गई। दुर्गा पूजा में केले, हल्दी, दारुहल्दी, अनार, अशोक, धान, अमलतास, जयंती और बेलपत्र समेत नौ पत्तों को मां दुर्गा के नौ स्वरूपों का प्रतीक माना जाता है. इसी दिन देवी की प्राण प्रतिष्ठा करने के बाद उनका आह्वान किया जाता है. इसके बाद उनकी षोडषोपचार यानि 16 चरणों वाली पूजा होती है. नवपत्रिका पूजन में देवी दुर्गा की मूर्ति के सामने आईना रखा जाता है और उस पर पड़ने वाले देवी के प्रतिबिंब को महास्नान कहते हैं. दुर्गा पूजा की सप्तमी की विशेष पूजा देवी का प्रिय भोग लगाने और उनकी आरती के साथ पूर्ण होता है. हिंदू मान्यता के अनुसार नवपत्रिका पूजा से किसानों को अच्छी फसल का आशीर्वाद मिलता है।


