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रोग, शोक और दुख को नियंत्रित करने वाली महाविद्या; बिलासपुर की चमत्कारी मां धूमावती का मंदिर।

इन दिनों पूरा विश्व शक्ति की आराधना में लीन है। बिलासपुर और आसपास भी देवी के ऐसे कई चमत्कारी मंदिर है, जिनके साथ कई रोचक कथाएं जुड़ी हुई है, इन्हीं में से एक है मां धूमावती का मंदिर। कहते हैं उनकी ही आराधना से भारत चीन युद्ध में सैनिकों की विजय हुई थी। इस मंदिर की क्या है विशेषता, चलिए माता के दरबार में चलकर स्वयं जानते हैं।

देशभर में शक्ति स्वरूपा मां भगवती के अनेक मंदिर है। जितनी मंदिर, उतनी मान्यताएं, उतनी कथाएं। मां शक्ति के विभिन्न रूप है। इनमें से कई ऐसे स्वरूप है जो अदभुत होने के साथ-साथ दुर्लभ भी है। इन्हीं में से एक है मां धूमावती। इन्हें रोग, शोक और दुख को नियंत्रित करने वाली महाविद्या माना गया है। पद्म पुराण के अनुसार मां धूमावती दुर्भाग्य की देवी है, जो मां लक्ष्मी की बड़ी बहन तो है, लेकिन उनका स्वरूप मां लक्ष्मी से बिल्कुल उल्टा है। पुराणों के अनुसार जब माता सती यज्ञ में भस्म हो रही थी तो उनके शरीर से जो धुआं निकला था, उससे मां धूमावती का जन्म हुआ था, इसलिए वह हमेशा उदास रहती है। इसलिए उनका स्वरूप भी वैधव्य वाला है। मां को सप्तम महाविद्या माना जाता है। विशेष कर मां धूमावती की आराधना गुप्त नवरात्रि में की जाती है। मान्यता है की मां धूमावती पीपल के पेड़ पर निवास करती है। इन्हें दरिद्रता, अलक्ष्मी और ज्येष्ठा के नाम से भी जाना जाता है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार पाप, आलस, गरीबी दुख और क्रूरता पर मां धूमावती का आधिपत्य है। यह देवी कौंवे पर सवार रहती है। इनका स्वरूप ऐसा होने के बाद भी यह भक्तों के दुख, दुर्भाग्य और दरिद्रता को दूर करती है। कहा जाता है कि एक बार क्रोध में आकर माँ धूमावती नर महादेव को ही भक्षण कर लिया था, इसलिए इनका संबंध भूख से भी है। देवी के स्वरूप को तामसी माना जाता है, इसलिए उन्हें तामसिक भोग चढ़ाया जाता है।

बिलासपुर के चिंगराज पारा में भी माँ धूमावती का अद्भुत मंदिर है, जहां दतिया की देवी माई धूमावती विराजमान है। यहां भक्त उन्हें प्रसन्न करने के लिए मिर्च की भजिया और नमकीन प्रसाद स्वरूप चढ़ाते हैं। यह बात किसी को भी हैरान करती है। सामान्यत मंदिरों में इस तरह से भजिया का भोग नहीं लगता, लेकिन यहां भजिया का ही भोग चढ़ता है।

अरपा नदी के किनारे चिंगराजपारा में मां धूमावती का यह मंदिर स्थित है जहां सामान्य दिनों में तो भक्त पहुंचते ही हैं लेकिन नवरात्र पर यहां भक्तों की कतार लग जाती है। यहां माता को भजिया का भोग चढ़ाने के साथ भक्त अपनी अर्जी चिट्ठी के माध्यम से माता को देते हैं। भक्तों का मानना है कि उनकी चिट्ठी में लिखी मनोकामनाएं मां अवश्य पूरा करती है।

बताया जाता है कि 2005 में पीतांबरा पीठ धूमावती मंदिर की स्थापना बिलासपुर में की गई। यहां जो भी भक्त सच्चे मन से चिट्ठी लिखकर और मिर्च की भजिया प्रसाद स्वरूप चढ़ाते हैं, माता उनकी मनोकामना को अवश्य पूरा करती है। अन्य मंदिरों से अलग यहां जिस तरह से माता को भोग के रूप में मिर्ची भजिया, दही बड़ा, जलेबी, पूरी आदि चढ़ाया जाता है वह माता को विशिष्टता प्रदान करती है। वैसे तो माता धूमावती की आराधना पूरे देश में की जाती है लेकिन उनके गिने चुने ही मंदिर देश में है। बताते हैं कि जब भारत चीन का युद्ध हो रहा था तब महागुरु ने माता धूमावती का आह्वान किया था और तीन दिन के भीतर ही हमारे देश में चीनियों को हार का मुंह देखना पड़ा था। पुजारी के अनुसार देवी तामसिक प्रवृत्ति की है इसीलिए देवी को प्याज लहसुन और अदरक से बने पकवान पसंद है और यही उन्हें प्रसाद में के रूप में चढ़ाया जाता है। भक्त अपनी मनोकामना चिट्ठी में लिखकर देते हैं जिसे मंदिर के पुजारी या सेवादार पढ़कर देवी को सुनते हैं। देवी जब भक्तों की मनोकामना पूरी कर देती है, फिर इन सारी चिट्ठियों को अमरकंटक के नर्मदा में विसर्जित कर दिया जाता है। यहां मां के सामने अर्जी देने दूर-दूर से माता के भक्त पहुंचते हैं। इस नवरात्र पर भी यहां विशेष पूजा अर्चना की जा रही है। यहां पहुंचने वाले भक्त देवी को मिर्ची भजिया, दही बड़ा, सेव, गठिया सहित नसमकीं पकवान चढ़ा रहे हैं तो वहीं मां के चरणों में रखी सूपा पर अपनी मनोकामना और मनचाही इच्छा वाली चिट्ठी कागज में लिखकर उस पर छोड़ दे रहे हैं। यहां स्थापित मां धूमावती सफेद वस्त्रों में विधवा के रूप में है। उन्हें सफेद पुष्प, सफेद चंदन ही अर्पित किया जाता है। माता यहां वरदानी, अभय मुद्रा में स्थापित है। माता धूमावती के अतिरिक्त इस मंदिर में और भी देवी देवताओं की प्रतिमायें स्थापित है, जिनकी पूजा- आराधना वर्ष भर की जाती है।

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