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बिलासपुर में तेज बारिश के बीच मनाया गया लोक पर्व भोजली, मितान बदने की परंपरा का हुआ पालन।

छत्तीसगढ़ का एक और लोक पर्व भोजली मंगलवार को पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। शाम होते ही युवतियां और महिलाएं सर पर भोजली की टोकरी लेकर नदी, तालाब और जलाशय में विसर्जन के लिए पहुंची। पूरे रास्ते भोजली गीतों की स्वर लहरिया तैरती रही।

छत्तीसगढ़ कृषि प्रधान प्रदेश है, इसलिए इसके पर्वों का ताना-बाना भी कृषि आधारित ही है। ऐसा ही एक पर्व है भोजली उत्सव। छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध लोक पर्वों में से एक भोजली इस मंगलवार को मनाई गई। भोजली का संबंध भी खेती किसानी से ही है, जहां घर की महिलाएं अच्छी वर्षा और अच्छी फसल की कामना करती है। भोजली का शाब्दिक अर्थ भू जल संवर्धन से है। क्योंकि बिना जल धान की खेती संभव नहीं। यह वह समय होता है जब कृषि कार्यों का पहला हिस्सा संपन्न हो चुका होता है और किसान अच्छी बारिश चाहता है। तभी देवी का आह्वान कर अच्छी वर्षा की कामना की जाती है।

भोजली की शुरुआत नियमानुसार नाग पंचमी से होती है। पहले नाग पंचमी पर दंगल के अखाड़े से मिट्टी लाकर टोकरी में गेहूं के दाने बोए जाते थे। कुछ स्थानों पर कुम्हार के घर से मिट्टी लाकर यह परंपरा निभाई जाती है। बांस की टोकरी में गेहूं के बीज बोकर उन्हें छाया में रखा जाता है। प्रतिदिन उन्हें हल्दी के पानी से सींचकर, दीप दिखाकर पूजा अर्चना की जाती है। इसलिए उनका रंग पीलापन दिए हुए होता है। पंचमी से नवमी तिथि तक यह बीज बोए जाते हैं और फिर रक्षाबंधन के अगले ही दिन भोजली का विसर्जन किया जाता है। बेटियां और महिलाएं पारंपरिक परिधान में सर पर भोजली की टोकरी रखकर देवी गंगा, देवी गंगा, लहर तुरंगा गाते हुए सरोवरों की ओर बढ़ चलती है।

भोजली मूलतः महिलाओं का पर्व है। यही कारण है कि इस दिन उनका उत्साह देखते बनता है। छोटी-छोटी बच्चियों से लेकर उम्रदराज महिलाएं भी भोजली विसर्जन के लिए घाट पर उसी उत्साह के साथ पहुंचती है, जहां भोजली गीत गाते हुए भोजली का विसर्जन किया जाता है। नारियल फोड़ कर उसका प्रसाद बांटते हैं। भोजली छत्तीसगढ़ का अपना फ्रेंडशिप डे भी है। विसर्जन के पश्चात भोजली एक दूसरे के कान में खोंसकर मितान बदने की भी परंपरा है। कहते हैं इस तरह से बने मितान यानी मित्र आजीवन इस रिश्ते में आबद्ध रहते हैं।

छत्तीसगढ़ के दूसरे सबसे बड़े नगर बिलासपुर में आधुनिकता और परंपरिकता का अद्भुत मेल है, इसीलिए यहां लोक पर्वों की वैसी ही धमक है, जैसी सुदूर ग्रामीण अंचलों में होती है। भोजली पर हर साल की तरह इस बार भी कई स्थानों पर बड़े आयोजन हुए, जहां इसे प्रतियोगिता का स्वरूप देते हुए पुरस्कारों की भी झड़ी लगा दी गई।

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